साजन

तुझको ही बस तुझको सोचू इतना तो कर सकती हूँ,,,,,,,,,
तेरे ग़म को अपना समझू इतना तो कर सकती हूँ ।।।।।।।।।।
मुझको क्या मालूम मुहब्बत कैसे करती है दुनिया,,,,,,,
हद से ज्यादा तुझको सोचू इतना तो कर सकती हूँ ।।।।।।।।।
इस दिन को तू मेरे सजना इतना तो ह़क दे देना,,,,,,,,,,,,
छलनी में से तुझको देखू इतना तो कर सकती हूँ ।।।।।।।।।
आज मुबारक वो दिन आया सामने मेरा साजन है,,,,,,,,,,
तेरे ग़म के आँसू पी लू इतना तो कर सकती हूँ ।।।।।।।।।।।
दो-दो चन्दा मेरे आगे आज खुशी का दिन है ये,,,,,,,,,,,
इक पल में ही सदियाँ जी लू इतना तो कर सकती हूँ

लिखना पढना छोड दिया तू बात करे हथियारो की,,,,,,,,,,,,
किसने तेरे दिल में भर दी ये बाते अंगारो की ।।।।।।।।।।।
कोमल तेरे दिल को आखिर किसने पत्थर कर डाला,,,,,,,,,,
जो तू फिक्र नही करता है प्यार भरे त्यौहारो की।।।।।।।।।
लड़वाऐगें तुझको ये तो मरवाऐगें आपस में,,,,,,,,,,,,,,,,
जाने तू क्यो बाते माने मज़हब के सरदारो की ।।।।।।।।।
गुरबत में मर जाये चाहे बात करेगें धर्मो की,,,,,,,,,,,,
ऐसी नीति रही है लोगो अब तक की सरकारो की ।।।।।।।।
अनपढ है ये जाहिल है ये,गुरबत में ही जाते है,,,,,,,,,
हर इक लफ्जो में लिखता हूँ बाते मै लाचारो की ।।।।।।।।।।
छोटे छोटे इन हाथो में दिखती है बन्दूक यहाँ,,,,,,,,,,,,,
नस्ल हमारी चलती है अब धारो पे,तलवारो की।।।।।।।।।
सबके हाथो में है खन्ज़र और किताबे छूट गयी,,,,,,,,,
ऊचाँई बढती जाती है नफरत की दीवारो की ।।।।।।।।।।।।
आपस में लड़ते रहने से हासिल क्या तुझको होगा,,,,,,,,,
चाँदी रोज़ कटी है बस धर्मो के ठेकेदारो की।।।।।।।।।।।।।।
डर बिकता, भय बिकता है और बिका है खून ‘लकी’,,,,,,,,,,
गिनती रोज़ बढी जाती है दहशत के बाजारो की ।।

मिट्टी से भी खुशबू आये गाँव हमारा ऐसा है,,,,,,,,,
जैसे खोई जन्नत पाये गाँव हमारा ऐसा है ।।।।।।।।।
तेरी आँखो का हर आँसू पौँछे प्यार मुहब्बत से,,,,,,,
रोता रोता तू मस्काये गाँव हमारा ऐसा है ।।।।।।।।
देखो अपने महमानो की इज्जत इतनी करते है,,,,,,
चाहे खुद भूखे रह जाये , गाँव हमारा ऐसा है ।।।।।।।
कैसे भी हालातो में भी साथ नही छोडेगें वो,,,,,,,,,
झगड़ा अपना खुद निपटाये गाँव हमारा ऐसा है ।।।।
कोई सुख हो या कोई दुख साथ हमेशा देते है,,,,,,,
गलती पे मिल कर समझाये गाँव हमारा ऐसा है ।।।
इक दूजे की खातिर अपनी जान गवाँ सकते है ये,,,,,,
दुश्मन से भी जा टकराये गाँव हमारा ऐसा है ।।।।।।
हर हालत में खुश रहते है चाहे लाख गरीबी हो,,,,,,,
सुख हो चाहे गम के साये गाँव हमारा ऐसा है ।।।।।।।
भोले भाले इन लोगो पर कैसे फिर इल्जाम लगे,,,,,,
जो आपस की कस्मे खाये गाँव हमारा ऐसा है ।

पसीना वो बहाकर देख बच्चो को खिलाता है,,,,,
जलाके खून सारा दूध वो उनको पिलाता है ।।।।।
अदाकारी गरीबो में गरीबी ला ही देती है,,,,,
जिसे ग़म भी हजारो है वही हँसकर दिखाता है ।।।
अमीरो सीख लो जाकर हुनर तुम भी गरीबो का,,
कि आँसू आँख में होते हुऐ कैसे छिपाता है ।।।।।।
खुशी तो चीज ऐसी है खुशी में रो ना पाओगे,,,,,
मगर जो है बहुत बेबस वही सबको हसाँता है ।।।।
बडा अफ़सोस होता है ख़ुदा की रहमतो पे अब,,,,
उसी सर पे नही छप्पर हवेली जो सजाता है ।।।।।
करू ना क्यूँ ‘लकी’ मै फ़ख्र उन बेबस गरीबो पर,,
निवाला छोड देता है मगर बच्चे पढाता है ।।।

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