साझा

ज़िन्दगी में जो ख़ुशी मिली है ए दोस्त,
बिन तेरे उस खुशी का क्या करूं…..
उसमें मुझे तेरा साझा भी चाहिए।

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जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

Responses

  1. बहुत ही बेहतरीन पंक्तियाँ हैं। भावगत विशेषता के साथ कलापक्षीय सौंदर्य अद्भुत है। वाह।

    1. सुन्दर समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी । आपका बहुत बहुत शुक्रिया सर 🙏

  2. मित्रता के महत्व को प्रतिपादित करती बेहतरीन lines। बहुत बढ़िया

  3. बहुत ही सुंदर कविता। यूँ ही निरंतर सुंदर तरीके से लिखते रहें।

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