सिसक रही तन्हाई, अब साथी से क्या होगा ????

सिसक रही तन्हाई
अब क्या साथी से होगा ?
जब मन के घाव बने नासूर
तब मरहम से क्या होगा ?
हम तो अपने ही घर में
हाँ, हो गये एक रोज पराये
बन बैठे आज फफोले
थे जो तुमने घाव लगाये
अभिमन्यु- सा तुमने
मुझको चक्रव्यूह में घेरा
जब हाथ था मैने बढा़या
तब तुमने ही था मुंह फेरा
मंजिल-मंजिल करके तुम
फिर मुझसे दूर गये थे
क्या भूल गये वो दिन तुम
जब मुझसे दूर गये थे…


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

16 Comments

  1. Geeta kumari - April 6, 2021, 8:09 am

    सिसक रही तन्हाई
    अब क्या साथी से होगा ?
    जब मन के घाव बने नासूर
    तब मरहम से क्या होगा ?
    ____________ अपने साथी को तनहाई में याद करती हुई कवि प्रज्ञा जी की, बेहद मार्मिक रचना। बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - April 6, 2021, 8:13 am

    अतिसुंदर मार्मिक भाव प्रस्तुत करती हुई रचना

    • Pragya Shukla - April 7, 2021, 10:45 pm

      आभार है आपका सर
      आपकी आलोचना मन भाती है

  3. vivek singhal - April 6, 2021, 10:56 am

    सिसक रही तन्हाई
    अब क्या साथी से होगा ?
    जब मन के घाव बने नासूर
    तब मरहम से क्या होगा ?
    हम तो अपने ही घर में
    हाँ, हो गये एक रोज पराये
    बन बैठे आज फफोले
    थे जो तुमने घाव लगाये..
    हृदय के घावों को शब्दों में पिरोकर लिखी गई रचना

  4. Rj sid - April 6, 2021, 11:12 am

    Your poem is very beautiful
    Nice thought

  5. neelam singh - April 6, 2021, 11:26 am

    वाह!!
    लोकप्रिय कवि प्रज्ञा जी का अद्भुत लेखन
    काबिलेतारीफ है

  6. Rishi Kumar - April 6, 2021, 4:16 pm

    काबिले तारीफ रचना

  7. jeet rastogi - April 6, 2021, 9:06 pm

    बहुत ही लाजवाब अभिव्यक्ति

  8. Ajay Shukla - April 9, 2021, 9:58 am

    वाह वाह क्या बात है
    शानदार प्रस्तुति

Leave a Reply