सोंच अलग है

सोंच अलग है
याददाश्त विलग है
अपनी चाहतों के लिए
वो आज हमसे अलग हैं

लाखों जमा कर दोस्तों ने
सारी उम्र की कमाई गवांई
शहर की छोटी जमी के लिए
वहीं पे सारी सुविधाएं जुटाई
सिसकती रही गांव भूमि बेचारी
जिन संसाधनों से जिंदगी बनाई

कुछ ने बहुत सी फसलें उगाई
जमीनें भी ली और बहुत सारी
वहीं जहां की खुशबू ने पढ़ाई
उन्हें शहर मंजिलो में पहुंचाई
करनी पड़ेगी उनकी पर बड़ाई
बचपन ने उन्हें यहीं खींच लाई

आकर्षण के तार को तोड़कर
गांव के स्नेह को यूं छोड़कर
आशीर्वादों से कैसे मुंह मोड़कर
पूर्वजों की धरोहर को तजकर
नया आशियाना बनाते हैं दोस्त
कहां से हिम्मत जुटाते हैं दोस्त

अपनेपन की कमी से शायद
बसें है जा इतनी दूर कहीं
कैद हो गये सुविधा सुरक्षा में
शहर की चकाचौंध भाया सही
गांव आज भी रह गया है वहीं
नई सोंच वहां कहां पहुंच सकी

सोंच अलग है
याददाश्त विलग है
अपनी चाहतों के लिए
वो आज हमसे अलग


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2 Comments

  1. Satish Pandey - February 28, 2021, 11:59 pm

    बहुत खूब, अति उत्तम रचना, भाव व शिल्प का बहुत सुन्दर समन्वय

  2. Pragya Shukla - March 8, 2021, 1:47 pm

    Nice

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