हमने सीख लिया है

अरि के आगे अडिग रहना है,
नहीं अरि से झुकना है।
हिम की ऊॅंची चोटी से,
यह हमने भी सीख लिया है।
फलों से लदी डाली ही अक्सर,
झुकती देखी दरख़्तों की।
सीधे खड़े अकड़े ठूॅंठ को,
कोई ना स्वीकार करे
ना फल है ना फूल है,
ना कोई सुगन्ध तो
कैसे कोई ॲंगीकार करे।
इसीलिए दरख़्तों से हमने,
झुकना सीख लिया है।
तेज़ ऑंधियों से हर कोई बचता,
तूफानों से बचने का ढूॅंढे रस्ता।
पवन के ठॅंडे हल्के झोंकों को,
जब हमने महसूस किया तो
कोमल भाव में रहना, बहना
हमने उस से सीख लिया है।
सूर्य, चन्द्र बाॅंटें निज उजाला,
बिना किसी स्वार्थ के
उनको देखकर हमने भी,
निस्वार्थ सेवा करना सीख लिया है।
पॅंछी को उड़ते देख गगन में,
यह ख़्याल आया है मन में
मंज़िल की ओर निर्बाध कदम से,
जैसी पॅंछी का उड़ना हो
पर फैला कर हमने भी,
लक्ष्य की ओर बढ़ना सीख लिया है।
______✍गीता

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Responses

  1. सीधे खड़े अकड़े ठूॅंठ को,
    कोई ना स्वीकार करे
    बहुत सुंदर रचना 👌
    झुकता है वो ही जिंदा है
    अकड़ता जो मुर्दा है

  2. सूर्य, चन्द्र बाॅंटें निज उजाला,
    बिना किसी स्वार्थ के
    उनको देखकर हमने भी,
    निस्वार्थ सेवा करना सीख लिया है।
    —- बहुत ही उच्चस्तरीय रचना। जीवन से जुड़े भावों को लिपिबद्ध करने की बेहतरीन कला है कवि में वाह।

    1. उत्साहवर्धन करती हुई इस समीक्षा के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी

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