हम किसान धरने पर

एक तो शीतलहर
दूजा बेगाना शहर।
फिर भी अटल रहेंगे
हम किसान धरने पर।।
हम क्यों माने हार बंधु
हम तो हैं अन्नदाता जग में।
पेट चले संग फैक्टरी चले
व्यापार पले अपनी पग में।।
मांग नहीं अपनी सोना है
ना मांगें हीरा-मोती हम।
अपनी फसल के घटे दाम
कभी न बर्दाश्त करेंगे हम।।
आलू होवे दो की अपनी
लेज बिके चालीस की।
अपना चिप्स बना खाऐंगे
मनो बात ख़ालिस की।।
विनयचंद ना दुखी रे
जिसका हम सब खाते हैं।
हट जा बादल नभ मंडल से
स्वर्ग लूटने हम आते हैं। ।


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9 Comments

  1. Geeta kumari - December 8, 2020, 12:23 pm

    किसानों का दुःख व्यक्त करती हुई बहुत सुंदर और यथार्थ परक रचना

  2. Praduman Amit - December 8, 2020, 5:20 pm

    सौ प्रतिशत सही कहा आपने।

  3. Pragya Shukla - December 8, 2020, 7:59 pm

    बहुत खूब

  4. Satish Pandey - December 8, 2020, 10:55 pm

    बहुत खूब, लाजवाब लेखन, सुन्दर कविता

  5. Suman Kumari - December 9, 2020, 5:25 pm

    सुन्दर

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