हम बंधते ही रहे।

हम बंधते ही रहे,
कभी विचारों तो कभी,
दायरों के धागों से,
सिमट कर रही जिंदगी,
उसी चार कोनों के भीतर,
जन्म से आजतक,
बस दीवारों के रंग बदले,
और लोगो के चेहरे,
कभी इस घर की मान बनी,
कभी उस घर की लाज,
फिर भी बांधते ही रहे हमें,
कभी रिश्तों के धागों से,
कभी आंसुओ की डोर से।।।


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14 Comments

  1. मोहन सिंह मानुष - September 1, 2020, 5:08 pm

    गृहस्थ जीवन से जुड़ी ग्रहणी के दुखी जीवन या फिर नारी के केवल चारदीवारी तक सीमित दुखदाई जीवन को प्रस्तुत करती बहुत ही उम्दा कविता

  2. Geeta kumari - September 1, 2020, 5:13 pm

    बहुत सुंदर रचना

  3. Satish Pandey - September 1, 2020, 5:20 pm

    बहुत सुन्दर तरीके से रिश्तों की बारीकियों पर नजर डाली गई है। बहुत खूब।

  4. Priya Choudhary - September 1, 2020, 6:52 pm

    बिल्कुल सही गृहस्ती में ग्रहणी हमेशा बंधी ही तो रहती है👏👏

  5. Prayag Dharmani - September 1, 2020, 7:38 pm

    वाह बहुत सुंदर

  6. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - September 2, 2020, 1:53 pm

    Sunder

  7. प्रतिमा चौधरी - September 2, 2020, 2:06 pm

    Thank you

  8. Deep Patel - September 24, 2020, 11:11 am

    nice

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