हिदायतें देती मां मुझे….

है हिदायतें देती मां मुझे।
घर जल्दी आना बेटी देर न करना।
मैं सोचती हूं अक्सर!
क्या यह देश मेरा घर नहीं!
क्या यह लोग मेरा परिवार नहीं!
फिर क्यों नहीं सुरक्षित ,
मैं अपने ही घर में।
या है यह देश पराया।
है हिदायतें देती मां मुझे।
रात के अंधेरे से बचना बेटी,
सुनसान अंधेरी गलियों से दूर रहना बेटी।
मैं अक्सर यह सोचती हूं!
यह अंधेरी गलियां क्यों नहीं जगमगा उठती।
हम बेटियों के गुजरने से।
घर का अंधेरा हम अक्सर,
रौशनी से दूर कर देते हैं।
पर अंधेरी गलियां कब रौशन होगी!
मैं सोचती हूं अक्सर।
क्यों चीख रह जाती है,
अंधेरों के बीच।
अब भी मुझे,
यही लगता है।
अगर यह देश,
बेटियों का घर ना बन पाया।
तो रहेगा अफसोस यही,
घर वह है जो सुकून और चैन देता है।
है हिदायतें देती मां मुझे।


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14 Comments

  1. Vasundra singh - September 29, 2020, 9:19 am

    बहुत सुंदर विचार हैं आपके, सचमुच ऐसा ही हो तो हर समस्या का हल हो जाये

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - September 29, 2020, 1:12 pm

    अतिसुंदर रचना

  3. मोहन सिंह मानुष - September 29, 2020, 1:25 pm

    समाज में जो कमियां हैं उन्हें सुधारने की बजाए हम महिलाओं पर पहरें लगाते हैं ,बंदिशें लगाते हैं जिसमें महिलाओं का कोई दोष नहीं होता है
    बहुत ही सुंदर एवं यथार्थपरक भावों का समावेश
    बहुत ही उम्दा लेखनी

    • प्रतिमा चौधरी - September 29, 2020, 2:17 pm

      कविता के भाव को थोड़े शब्दों में बता देना आपकी समीक्षा को अच्छे से आता है बहुत-बहुत आभार सर

  4. Deep Patel - September 29, 2020, 9:00 pm

    बहुत सुंदर विचार

  5. Pushpendra Kumar - September 30, 2020, 8:06 pm

    Awesome line

  6. Aditya Kumar - September 30, 2020, 9:22 pm

    मुक्तक से मैं अत्यंत प्रभावित नहीं होता परंतु यह हृदयस्पर्शी है।

  7. Siya Chauhan - October 1, 2020, 12:00 am

    Sahi kaha…

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