हिन्दी गजल- बंजर भूमि की रोटी |

हिन्दी गजल- बंजर भूमि की रोटी |
बहारों के मौसम गुल खिल जाये दिखाना मुझे |
बागो फूल भवरा गर मिल जाये दिखाना मुझे |
जहर भर दिया फिज़ाओ मिल हमने और तुमने |
मिट्टी बीज अंकुर गर निकल आए दिखाना मुझे |
गोबर खाद मिल मिट्टी पैदावार बढ़ाती थी कभी |
यूरिया फास्फेट जमी खिल जाये दिखाना मुझे |
गाय बैल और जानवर अब कोई पालता ही नहीं |
ट्रेकटर मशीन खेती गर बढ़ जाये दिखाना मुझे |
तालाब कुआ पोखर युही नहीं खोदवाते थे लोग |
बिना इनके जमी पानी मिल जाये दिखाना मुझे |
जमी की नमी जरूरी है खेती किसानी के लिए |
बिना पानी खेत बीज उगने लगे दिखाना मुझे |
खाद रासायन जितना मिलाओगे जहर खाओगे |
शब्जी बुझी जहर खा कोई हँसता मिले दिखाना मुझे |
हमारी लापरवाही मिट्टी की जान जा रही अब |
बंजर भूमि की रोटी कोई खाता मिले दिखाना मुझे |
श्याम कुँवर भारती [राजभर] कवि ,लेखक ,गीतकार ,समाजसेवी ,
मोब /वाहत्सप्प्स -995550928
Email – shymakunvarbharti@gmail.com

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