हे अटल! अटल रहो

अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती पर विशेष प्रस्तुति:-
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हे अटल ! अटल रहो
यूँ ही हृदय में बसे रहो
दिव्य ज्योति बनकर सदा
साहित्य में जले रहो
प्रकाश दो सूर्य को तुम
मेरा हौसला बने रहो
हे अटल ! अटल रहो
यूँ ही हृदय में बसे रहो
कह गये तुम सौ दफा-
“हार नहीं मानूंगा
रार नहीं ठानूंगा
काल के कपाल पर
लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं”
मेरी कलम की धार तुम
हमेशा ही बने रहो
जब बोलते थे तुम अटल
तो खुल जाते थे मस्तक पटल
तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता था आसमां
लेखनी तुम्हारी और स्वस्थ्य राजनीति का
लोहा हिन्दुस्तान ही नहीं
मानता था सारा जहान
दल हो या विपक्षी हों
प्रेम तुमसे करते थे
ये हिन्दुस्तान ही कुछ और था
जब तुम प्रधानमंत्री थे
हे भारत रत्न ! तुम सदा
यादों में सजे रहो
हे अटल ! अटल रहो
यूँ ही हृदय में बसे रहो।।

काव्यगत सौन्दर्य व विशेषताएं:-

अटल जयंती पर मेरी कलम से अटल जी को श्रद्धांञ्जलि..
अटल जी अपनी चिरपरिचित मुस्कान से जाने जाते थे वह एक ऐसे नेता थे जो भाजपा व विपक्षी सभी को समान रूप से प्रिय थे
उसका कारण यह था कि वह अपने राजनीतिक फायदे के लिए कभी शब्दों व मर्यादा की सीमा नहीं लांघते थे जब उन्हें कुछ गलत होता दिखाई पड़ता था तो वह व्यंगात्मक रूप से तंज कसते थे
वह भारत को एक कुशल देश वा सबकी अगुवाई करने वाला देश बनाने की कोशिश में थे
उन्होने प्रधानमंत्री का पद हँसते-हँसते छोंड़ दिया था…

वह कहते थे राजनीति मुझे लिखने का मौका नहीं देती फिर भी वह जब भी लिखते थे तो कमाल का लिखा करते थे…

“अपने सुंदर व्यवहार के कारण वह सदा हमारे हृदय में जीवित रहेंगे”

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