हे रावण

हर दौर में अधर्म का प्रारम्भ एक नव-चरण होता रहा l
हर एक युग में “हे रावण” तेरा नव-अवतरण होता रहा l
हर बार अग्नि परीक्षाओं से गुजरी सीता सती सी नरियाँ ,
किसी न किसी रूप में औरत का यूँ अपहरण होता रहा l आखों पर पट्टी बांधकर इन्साफ तो तख़्त पर बैठा रहा ,
भरी सभा में किसी पंचाली का यूँ चीर-हरण होता रहा l
हर दौर में भरोसा तोड़कर पीठ में हैं खँजर उतारे गए ,
हर घर में कोई तो घर का भेदी वभीषण होता रहा l
पाप कितना बलवान हो पर यह बात बिल्कुल सत्य है ,
हर एक युग में राम से ही पराजित यह रावण होता रहा l

Published in Poetry on Picture Contest

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