है चाह मिलूं उससे जो अक्सर

गजल

है चाह मिलूं उससे जो अक्सर नहीं मिलता |
दीवार घरों में है मगर घर नहीं मिलता |

ये आप भी देखें है कि बस मुझको भरम है |
हर शख़्स परेशान है खुलकर नहीं मिलता |

इस ज़िन्दगी के चिथड़े सिलाने है मुझे सब |
इस शहर में पर कोई रफूगर नहीं मिलता |

जज्बाती दिलों ने मेरे जब आग लगा ली |
इस से कोई गमगीन तो मंज़र नहीं मिलता |

सन्नाटे हैं तनहाई है रुसवाई है दिल में |
धोखा जो जमाना दे वो पढ़ कर नहीं मिलता |

वो प्यास बुझा देती मेरी आज सभी , पर |
अच्छा है कि प्यासे को समंदर नहीं मिलता |

हैं दोस्त भी ‘ अरविन्द ‘ बहुत सारे मेरे पर |
जब दिल को जरूरत हो तो दिलवर नहीं मिलता |
अरविन्द शुक्ला ( गोंडा )

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