हौसला

हौंसले के दम पर जीते आ रहा हूं,
लहू को बहाकर घूंट पीते आ रहा हूं।
पहचान की परवाह करना मैं छोड़ दिया,
धर्म कर्म से जीने का सलीका जब से सीखा हूं।।

✍महेश गुप्ता जौनपुरी


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6 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - July 12, 2020, 10:28 pm

    Nice

  2. Abhishek kumar - July 12, 2020, 11:15 pm

    जीता
    पीता
    परवाह मैंने
    धर्म-कर्म या
    धर्म, कर्म
    बाकी सुंदर भाव

  3. Amrita Dabi - July 13, 2020, 12:05 am

    nice

  4. Anita Sharma - July 13, 2020, 7:26 am

    Badiya

  5. Satish Pandey - July 13, 2020, 7:27 am

    👏

  6. प्रतिमा चौधरी - September 26, 2020, 4:04 pm

    बहुत सुंदर विचार

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