क़र्ज़

क़र्ज़ शायद पिछले जनम का चुकाना पड़ता है,
इसीलिए नन्हें कन्धों को वजन उठाना पड़ता है।

राही अंजाना

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“लाडली”

मैं बेटी हूँ नसीबवालो के घर जनम पाती हूँ कहीं “लाडली” तो कहीं उदासी का सबब बन जाती हूँ नाज़ुक से कंधो पे होता है…

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