”भौरे गायें “


अब गीत कुसुम कमनीय सूना
मंद -मंद मत मुस्का
रंग -चित्र रच -रच के
इठला और बल खा |
तेरी -मेरी गढ़ी कहानी
उल्लासों से भरी जवानी
कविता में आ गई रवानी
हुआ सबेरा अब कुछ सोचो
क्षणिक विभव है पानी -पानी |
विमल धरा का रूप रंग रस
भू पर पैर की रही निशानी |
रसिक रसीले भौरे आते
प्रीति-प्रतीति पथ दिखलाते
यहाँ वहाँ उपभोग में लेकर
छले-डाले कहाँ तुम जाते ?
बन कोमल कमनीय- कलेवर
देवों के भी मन को भाते |
रसिकों का श्रृंगार सहज बन
आते-जाते औ इतराते
रसिक -रसीली रसिकाओं संग,
हार और उपहार बन जाते |
खुलकर गीत ‘मंगल ‘गाते
अपना रूप -आभार दिखाते ||
https://plus.google.com/collection/kFnskB

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