ओमप्रकाश चंदेल, Author at Saavan - Page 4 of 5's Posts

नारी बता दिया

नारी बता दिया

मुझ जैसी भोली भाली को, “काली” बता दिया । झाङु ,पोछा, छितका की तो, घर वाली बता दिया । सज संवर के निकली तो मतवाली बता दिया । रोती बिलखती गुङिया को दिलवाली बता दिया । तिनका मांगने से, नखरे वाली बता दिया । बैठ गई अगर चौराहे पर गाली बता दिया । जिवित रहने दिया नहीं, अवतारी बता दिया । हक देने के डर से ही मर्दों ने, “ना” “री” बता दिया ।।……. ओमप्रकाश चन्देल &... »

नफ़रत की फसल उगी है

नफ़रत की फसल उगी है

»

आज अवध में होली है और , मैं अशोका बन में

आज अवध में होली है और , मैं अशोका बन में

आज अवध में होली है और, मैं अशोका बन में। रंग दो मोहे राजा राम , मैं बसी हूँ कन कन में।। आँखे रोकर पत्थर हो गयी, आँसू से भरे सागर। तुम भी देख लेना साजन, हालत मेरी आकर।। छोड़ आई हूँ सासें रसिया, तेरे निज चरणन में। आज अवध में होली है और , मैं अशोका बन में॥ याद आती है मिथला की बोली, और अवध होली। छोड़ के अपनी सखी, सहेली , मैं रह गयी अकेली॥ तेरे दम पर चली थी घर से, बिछड़ गयी कानन में। आज अवध में होली है... »

मैं बच्चा बन जाता हूँ

मैं बच्चा बन जाता हूँ

कविता … “मैं बच्चा बन जाता हूँ” न बली किसी की चढ़ाता हूँ। न कुर्बानी से हाथ रंगाता हूँ।  रोने की जब दौड़ लगती है, मैं गिद्धों पर आंसू बहाता हूँ। न मैं मंदिर में जाता हूँ। न मस्जिद से टकराता हूँ।  ईश्वर मिलने की चाहत में,  मैं विद्यालय पहुँच जाता हूँ। छोटे-छोटे कृष्ण, सुदामा, पैगम्बर, बुद्ध मिल जाते हैं। हमसे तो बच्चे ही अच्छे, जो एक ही थाली में खाते हैं। जाति, धर्म का ज्ञान नहीं बच्चे मन के सच... »

जब हम बच्चे थे

जब हम बच्चे थे

जब हम बच्चे थे , चाहत थी की बड़े हो जायें | अब लगता है , कि बच्चे ही अच्छे थे || अब न तो हममें कोई सच्चाई है , न ही सराफ़त , पर बचपन मे हम कितने सच्चे थे | जब हम बच्चे थे || अब न तो गर्मी कि छुट्टी है , न ही मामा के घर जाना , माँ का आँचल भी छूट चुका है , पापा से नाता टूट चुका है , पहले सारे रिस्ते कितने सच्चे थे | जब हम बच्चे थे|| न तो कोई चिंता थी , बीबी बच्चे और पेट की, न ही कोई कर्ज़, बैंक ,एलआईसी... »

मेरा रंग दे बसंती चोला

मेरा रंग दे बसंती चोला

जिस चोले को पहन भगत सिंह खेले, अपनी जान पे जिसे पहन कर राज गुरु मिट गए, अपनी आन पे आज उसी को पहन के देश का बच्चा, बच्चा का बोला मेरा रंग दे बसंती चोला, माई रंग दे बसंती चोला ओमप्रकाश चंदेल “अवसर” 7693919758 »

खो गई मिट्टी की लाली

खो गई मिट्टी की लाली

    सोमवार, 17 अगस्त 2015 कविता …..खो ग ई मिट्टी की लाली………   खो गई है मिट्टी की लाली। मुरझा गई है धान की बाली॥ सुख गई है बरगद की डाली उजड़ी बगिया रोता माली॥ खो गई है गिद्धों की टोली। गुमसुम  है कोयल की बोली।। उठ गई गॊरिया की डोली । राजहंसनी को लगी है गोली॥ उठी गर्जना भूकंप वाली। बादल फूटा बरसा पानी।। बह गई बस्ती भुमि खाली। कंजूस हो गया पर्वत दानी।। लुट रही जंगल की झोली । स... »

अपने काम आप करो

……कविता……. अपने काम, आप करो, मजदूरों को माफ़ करो। रहना है, अगर ठाठ से;  तो साफ-सुथरा इंसाफ करो। हमको तुम, माफ़ करो, अपना, मन साफ़ करो। अपनाना है, अगर हमें;  तो पहले सीधे मुँह बात करो। अपने दिल पर हाथ रखो, फ़िर प्यार की बात रखो। अब हमसे, मत कहना, अच्छे दिन पर विश्वास रखो । अब और नहीं  सौगात रखो, मेहनत का अहसास रखो । और नहीं, चमकाना मुझे, कपड़े ,बर्तन अपने पास रखो। वेतन की नह... »

छप्पर उड़ गई है मिट्टी की दीवारों से

छप्पर उड़ गई है मिट्टी की दीवारों से

कविता … “ प्रेम ही बांटो हरदम, आप अपने सूझ-बुझ से” छप्पर उड़ गई है, मिट्टी की दीवारों से।        तूफाँ भी मांग रही है मदद, कामगारों से।।                    कट्टरता की बू आती है, अब बयारों से।           मुर्दे फिर से जी उठे हैं, धार्मिकता नारों से।। रोशनी की चाहत है, चिता के अंगारों से।       मोह भंग हुआ क्यों? दीपक के उजियारों से।।           संदेशा कह देना मैना, तैयार रहे कहारों से। आग कहीं ... »

सिर पर जूता पेट पर लात

सिर पर जूता पेट पर लात

सिर पे जूता, पेट पे लात। दिल खट्टा और मीठी बात॥ नियम, कानून अमीरों का, अपने तो बस खाली हाथ॥ पूछ परख लो भूखों से क्या है तुम्हारी जात? पेट भरो बातों से, गोदाम तले रखो अनाज। मजबूरी है मजदूरी मेहनत का नहीं देना दात। वादों से क्या भूख मिटे या चूल्हों में जलती आग।। वोट मांग लो हमसे पर रहने दो यह सौगात। नारों से क्या तन ढक लें? समझ गये तुम्हारी बात।। उठो, बैठो, सब करो स्वांग रचा लो सारे आज। फर्क नहीं पड... »

Page 4 of 512345