Panna, Author at Saavan - Page 11 of 12's Posts

कैसे करें शिकवे गिले हम उनसे

कैसे करें शिकवे गिले हम उनसे

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ज़ाकिर भी लिखूं तो जिक़्र उन्ही का आता है

ज़ाकिर भी लिखूं तो जिक़्र उन्ही का आता है

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शाम ओ सहर उनके ख्यालों में खोए रहते है

शाम ओ सहर उनके ख्यालों में खोए रहते है

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अफ़साने मोहब्बत के होठों तक आ नहीं पाते

अफ़साने मोहब्बत के होठों तक आ नहीं पाते

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न उस रात चांदनी होती

न उस रात चांदनी होती

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ये कैसा तसव्वुर, कैसा रब्त, कैसा वक्त है

ये कैसा तसव्वुर, कैसा रब्त, कैसा वक्त है

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इश्तेहार सी हो गयी है ज़िंदगी मेरी

इश्तेहार सी हो गयी है ज़िंदगी मेरी

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शोक ए हिज़्र करूं या जश्न ए वस्ल करूं

शोक ए हिज़्र करूं या जश्न ए वस्ल करूं

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गंगा की व्यथा

जीवन का आधार हूं मैं भागीरथ की पुकार हूं मैं मोक्ष का द्वार हूं मैं तेरे पूर्वजों का उपहार हूं मैं तेरा आज, तेरा कल हूं मैं तुझ पर ममता का आंचल हूं मैं हर युग की कथा हूं मैं विचलित व्यथित व्यथा हूं मैं तेरी मां हूं मैं, गंगा हूं मैं| अनादि अनंत काल से हिमगिरी से बह रही तेरी हर पीढ़ी को अपने पानी से सींच रही मेरी धारों से गर्वित धरा धन-धान से फूल रही विडंबना है यह कैसी? यह धरा ही मुझको भूल रही क्ष्... »

तुझसे रुबरु हो लूं मेरे दिल की आरजू है

तुझसे रुबरु हो लूं मेरे दिल की आरजू है

तुझसे रुबरु हो लूं मेरे दिल की आरजू है तुझसे एक बार मैं कह दू, तू मेरी जुस्तजु है भॅवरा बनकर भटकता रहा महोब्बत ए मधुवन में चमन में चारो तरफ फैली जो तेरी खुशबु है जल जाता है परवाना होकर पागल जानता है जिंदगी दो पल की गुफ्तगु है दर्द–ए–दिल–ए–दास्ता कैसे कहे तुझसे नहीं खबर मुझे कहां मैं और कहां तू है शायर- ए- ग़म तो मैं नहीं हूं मगर मेरे दिल से निकली हर गज़ल में बस तू है »

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