Tej Pratap Narayan, Author at Saavan - Page 2 of 4's Posts

अन्याय

अन्याय इस लिए नही हैं कि वह बहुत शक्तिशाली है और उसका पलड़ा भारी है वह हर जगह छाया है… उसने अपना घर बसाया है अन्याय इसलिए है क्यों कि हम अपनी आवाज़ उठा नही पाते अपनी बात पहुंचा नही पाते उसकी नीव हिला नही पाते आँखे मूंदे रहते हैं समाज को बांटे रहते हैं कभी जाति के नाम पर कभी धर्म के नाम पर कभी सम्बन्धों की सार्थकता के नाम पर कभी व्यहार्यता के नाम पर और अन्याय बढ़ता जाता है सूरज को निगलता जाता है... »

ज़िंदगी

ज़िंदगी में ऐसे काज करो कि ज़िंदगी पे थोड़ा नाज़ करो ज़िंदगी को रिलैक्स करो ज़िंदगी का हेड मसाज़ करो फिर … ज़िंदगी से कुछ सवाल करो ज़िंदगी पे यक़ीन करो ज़िंदगी को न ग़मगीन करो माँ की आँखों का तारा बन कर अँधेरे में सितारा बनकर ज़िंदगी को ज़रा रंगीन करो ज़िंदगी के तनिक हमराज़ बनो ज़िंदगी में एक साज़ बनो मज़लूमो की आवाज़ बनो मासूमियत ,अल्हड़पना और इंसानियत की ज़िंदा यहाँ मिसाल बनो । तेज »

जब कोई धर्म साज़िशों का पुलिंदा बन जाता है

जब कोई धर्म साज़िशों का पुलिंदा बन जाता है तब धर्म केवल धंधा बन जाता है शोषण और लूटपाट ही दलालों का एजेंडा होता है इंसानियत मर जाती है और खोखला धर्म ही केवल ज़िंदा होता है देवी पूजी जाती हैं और स्त्रियों का शोषण होता है छुआ-छूत ,झूठ और पाखंड का दृश्य बड़ा भीषण होता है ईश्वर के बहाने आदमी को लतियाया जाता है पशु पूजे जाते हैं और इंसानो को मरवाया जाता है पाप ,पुण्य बन जाता है शरीफ़ होना संताप हो जाता है ... »

poem

एक फूल के लिए कितना मुश्किल होता है कि वह अपनी पंखुड़ियों को तूफानों से बचा ले छिटकने न दें … पराग कणों को बिखरने न दे एक पेंड के लिए बड़ा कठिन होता है अपने अस्तित्व को बनाए रखना अपनी जड़ों में समाए रहना और अपनी शाखाओं को बचाए रखना धूप से ,बारिश से,सूखा से और बाढ़ से एक ट्रेन भी संतुलन बना लेती है दो पटरियों के बीच पटरियों से टकराती हुई चोट पर चोट खाती हुई फिर भी चलती जाती है अपने सफ़र पर बिना रु... »

मैं और तुम

मैं और तुम साथ साथ बड़े हुए दोनों साथ- साथ अपने पैरों पर खड़े हुए तुम्हारी शाखाएं बढ़ने लगीं पत्तियां बनने लगीं दोनों एक साथ जीवन में आगे बढ़े अपने -अपने कर्मों के साथ् तुमने जीवन को हवा दी साँसे दी जीने के लिए छाया दी बैठने के लिए कितनों को आश्रय दिया रहने के लिए मैंने भी घर बनाया रहने के लिए नींव डलवाई दीवाल खिंचवाई खिड़कियां दरवाज़े लगवाये फिर घर के फर्नीचर आये सब तुम्हारे कारण ही तुम्हारे अंग -अंग क... »

छटपटाहटों की ज़ुबान

अपनी छटपटाहटों को ही देता हूँ मन के जज़्बातों को डायरी में उतार लेता हूँ ये छटपटाहटें सिर्फ मेरी अपनी ही नहीं औरों की छटपटाहटों को भी उधार लेता हूँ अंदर और बाहर की लड़ाईयों के लिए कलम को हथियार बना लेता हूँ । तेज »

यह बात अफवाह सी लगती है !

ये बात अफवाह सी लगती है कि ,सच्चा प्रेम कहीं मिला भीड़ में कहीं इंसान दिखा यह बात अफवाह सी लगती है कहीं ज्ञान का दीपक जला किसी के हिस्से का अँधेरा मिटा कुछ ज़िन्दगियों को बसेरा मिला किसी की ज़िन्दगी में सवेरा हुआ यह बात अफवाह सी लगती है कि,कहीं ईमानदार आगे बढ़ा कोई शोषित दलित उन्नति के शिखर पर चढ़ा कहीं जाति,धर्म ,रंग,लिंग के भेद पर भेदभाव नहीं हुआ कहीं भ्रष्टाचार का प्रभाव कम हुआ यह बात अफवाह सी लगती ... »

यात्रा जो पूरी न होती ।

शाम का समय सूरज विश्राम करने को तत्पर दिन पर तपने के बाद सारी दुनिया तकने के बाद अपूर्ण ख्वहिशे दिन भर की मन में रखे हुए ये सोंच कर कि चलों रात में चन्द्रमा की शीतल छाया होगी पर ये क्या ये तो अँधेरी रात थी केंवल घनघोर अँन्धेरा दिख रहा चारों ओर असमय ही बादलों ने बरसात की तन तो भीग गया पर मन अतृप्त रहा अपने अतृप्त मन के साथ सूरज रात में यात्राएं करने लगा इस छोर से उस छोर तक बिन बात भटकने लगा वो कुछ ... »

Two Liner

हरी जाली से देखने पर सूखे पेंड भी हरे लगते हैं नज़र का फ़ेर हो जाए तो पिलपिले भी खरे लगते है । तेज »

होते हैं

एक युद्ध में कितने युद्ध छिपे होते हैं हर बात में कितने किंतु छिपे होते हैं नींव का पत्थर दिखाई नहीं पड़ता अक्सर रेल चलती है पर पटरियों के जैसे सिरे दबे होते हैं जिसने क़त्ल किया उसका पता नहीं चलता जब औरों के कंधों के सहारे बंदूक चले होते हैं रक्षा कवच होता है धूर्त और मक्कारों के पास फंसते वही हैं जो लोग भले होते हैं यकीन उठता जाता है इंसान का इंसानों से छांछ भी फूंक कर पीते हैं जो दूध के जले होते ... »

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