Tej Pratap Narayan, Author at Saavan - Page 4 of 4's Posts

वह

वह आसमान में सीढियां लगाए चढ़ा जा रहा है जो पीछे था आगे बढ़ा जा रहा है देखता जा रहा है वह सपने पे सपने यथार्थ के बल ने टेके हैं घुटने वह हरी दूब है कहीं भी उग सकता है उखाड़ कर फेक देने के बाद जहाँ भी फेका जाएगा उग जाएगा जिएगा खुद औरों को ज़िलायेगा हरापन ही फैलाएगा बसंत ही लाएगा वह जीत है लेकिन हार को भी गले लगाएगा वह गीत है दुःख में भी गाया जाएगा और सुख में भी गाया जाएगा वह प्रेम है प्रेम ही फैलायेगा ... »

गंध

वह अदृश्य गंध अनाम सी अपरिभाषित सी मन में बसी हुई जानी पहचानी सी जिसकी खोज ज़ारी है कल्पना के कितने ही क्षण जी उठते हैं अनिरवचनीय आंनद के रस पी उठते हैं हवा में कुछ घुल सा जाता है जब आँचल तेरा लहराता है अद्भुत सी अंगड़ाइयां तेरी सूर्य को पराजित करती परछाइयाँ तेरी रात में चंद्रमा भी टकटकी लगाए रहता है थोड़ी सी गंध बस जाए उसके मन में भी वह कहता है पर दूरियों का क्या करे वह मज़बूरियों का क्या करे वह सिर्... »

यदि जड़ें ऊपर हो

यदि जड़ें ऊपर हो और तने नीचे तो न जड़ें गहराई पा सकती हैं और न तने का ही विकास होता है यदि जहां खिड़की होनी चाहिए वहां दरवाजे हों जब शांत वातावरण की चाहत हो तब बज रहे बाजे हों ऐसे में न शुद्ध हवा होती है और न ही पर्याप्त प्रकाश होता है यदि जहां खेत खलिहान होने चाहिए वहां कंक्रीट का जंगल हो जहां कानून ,व्यवस्था का राज्य होना चाहिए वहां अव्यवस्था का दंगल हो ऐसे में न सब के लिए रोटी होती है और न ही कोई ... »

Titleless

मेरे बाहर के यूनिवर्स को और मेरे अंदर के यूनिवर्स को मेरे अंतर्द्वंद को और बहिर्द्वंद को कविताएँ तराज़ू की तरह दोनों पलड़ों पर बिठाए रखती हैं कभी यह पलड़ा भारी हो जाता है तो कभी वह कविताएं नाव की तरह ज़िंदगी को अपने कंधों पर बिठाए हुए समस्त विषादों ,वेदनाओं ,चेतनाओं और संवेदनाओं को उठाए हुए जीवन की धुरी बन जाती हैं जीवन का नज़रिया और जीने का ज़रिया बन जाती हैं गहन अनुभूतियों को शब्द देती हुई शोर भरे वात... »

समीकरण

कुछ समीकरण पारस्परिक खींचतान झूंठी प्रतिस्पर्धा ईर्ष्या ,द्वेष अहंकार सृजन और विसर्जन व्यक्तित्वों का टकराव झूठी अफवाहें सूनी निगाहें आत्मिक वेदना कम होती चेतना शीत युद्ध अलग- अलग ध्रुव विलगित से निकाय न भरने वाले घाव चाँद का उगना कोने कोने को प्रकाशित करना रात अनमनी सोई सी चीखती दीवार कर्ण पट का फट जाना आदमियों का ज़िंदा गोस्त हो जाना श्वान ,बिलाव शिकारों की ताक में पेट भरने के फ़िराक़ में इंसानों क... »

समीकरण

कुछ समीकरण पारस्परिक खींचतान झूंठी प्रतिस्पर्धा ईर्ष्या ,द्वेष अहंकार सृजन और विसर्जन व्यक्तित्वों का टकराव झूठी अफवाहें सूनी निगाहें आत्मिक वेदना कम होती चेतना शीत युद्ध अलग- अलग ध्रुव विलगित से निकाय न भरने वाले घाव चाँद का उगना कोने कोने को प्रकाशित करना रात अनमनी सोई सी चीखती दीवार कर्ण पट का फट जाना आदमियों का ज़िंदा गोस्त हो जाना श्वान ,बिलाव शिकारों की ताक में पेट भरने के फ़िराक़ में इंसानों क... »

बेड़ियां

बेड़ियां जो पैरों में उसे घुंघरू बना लें आओ ज़िंदगी का मज़ा लें नाच ,गा लें औरों को नचा दें ज़िंदगी को खुशियों से सज़ा लें आओ बाधाओं को अवसर बना लें सूखती नदियों में बादलों को बरसा दें । आसमान में खेती करके धरती को लहलहा दे सबकी भूख मिटा दे आओ सब मिलकर असंभव को संभव बना दें । »

साध्य और साधन

शोषक और शोषित दो समांतर रेखाओं की तरह हैं जिनका कभी मिलन नहीं होता इसलिए शोषण का कभी अंत नहीं होता शोषक चाहे अफ्रीका का हो चाहे अमरीका का हो हिंदुस्तान का सीरिया या पाकिस्तान का उनकी भाषाएँ अलग हैं मान्यताएं अलग हैं चेहरे अलग हैं पर मानसिकताएं एक जैसी हैं उनके तने अलग अलग हैं उनकी शाखाएं पतली मोटी हो सकती हैं उनकी पत्तियां संकरी चौड़ी हो सकती हैं उनके फूल विविध रंगों के हो सकते हैं पर ज़मीन के अंदर ... »

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