साप्ताहिक कविता प्रतियोगिता

सर्दी का मौसम

तुम मुझे ओढ़ लो और मैं तुम्हें ओढ़ लेता हूँ, सर्दी के मौसम को मैं एक नया मोड़ देता दूँ। ये लिहाफ ये कम्बल तुम्हें बचा नहीं पाएंगे, अब देख लो तुम मैं सब तुमपे छोड़ देता हूँ। सर्द हवाओ का पहरा है दूर तलक कोहरा है, जो देख न पाये तुम्हे मैं वो नज़र तोड़ देता हूँ। लकड़ियाँ जलाकर भी माहोल गर्म हुआ नहीं, एक बार कहदो मैं नर्म हाथों को जोड़ देता हूँ। ज़रूरत नहीं है कि पुराने बिस्तर निकाले जाएँ, सहज ये रहेगा मैं जिस... »

Sardi

वसंत को कहा अलविदा, ग्रीष्म और वर्षा काल बीता अब शरद और हेमंत अायी, सर्दी शिशिर तक छाई ये सर्द सर्द सी राते, इसकी बड़ी अजीब है बातें कहीं मुस्कान अोस सी फैलायी, कहीं दर्द दिल को दे आयी जब संग ये मावठ लाती, बारिश संग उम्मीद जगाती रबी की फसले हर इक, खेतों की शान बढ़ाती बर्फिली हवाओं बीच, करता किसान रखवाली लेकिन जब पाला गिरता, फिकी हो जाती दीवाली माना व्यापार है बढ़ता, शादी का सीजन खुलता संक्रांत क्र... »

सर्दी

तेरा चुपके से आना गजब, घंटो धूप में बिताना गजब। आग के पास सुस्ताने लगे हैं, तुझे हर वक्त पास पाने लगे हैं। तेरे यादों को मन में समेटे बैठे हैं तन को कम्बल में लपेटे बैठे हैं। तु आती हर साल हमें मिलाने के लिए, मिठी यादो को जिंदगी में घुलानें के लिए। सर्दी सिर्फ तु ही मेरे साथ वफा करती हैं, प्रेयसी के यादों को जिंदा करती हैं। »

Ai sardi suhani si

किसी नाजुक कली सी, आंखें कुछ झुकी हुई शरमाई सी, हौले हौले दबे पांव आई ही गई सर्दी सलोनी सी, खिली हुई मखमली धूप में, आई किसी की याद सुहानी सी, दबी दबी मुस्कुराहट, होठों पर छाई सी, पता चला नहीं कब ढल गया दिन यूं ही, आई ठिठुरन की रात लिए कुहासों की चादर सी, सुबह धुंध का पहरा है, लगता बादलों का जमावड़ा सा, ढकी है चादर धुंध की राहों में, दूर-दूर तक कुछ भी नजर नहीं आता राहों में, गर्म चाय की चुस्की दे र... »

सर्दी और बेबस गरीब बच्चे

रूह भी कांपती है ठंडक मे कभी- कभी, याद आती है हर मजबूरियाँ सभी तभी।  इन्सान को ज़िन्दगी की कीमत समझनी चाहिये,  जो हो सके मुनासिब वह रहम करना चाहिये।  जीवन है बहुत कठिन कैसे यह सब बताऊँ?  मजारों पर शबाब के लिए चादर क्यों चढ़ाऊँ?  ठिठुरता हुआ मुफलिस दुआयें कम न देगा,  खुदा क्या इस बात पर मुझे रहमत न देगा।। »

सर्दियों की धूप-सी

सर्दियों की धूप सी लग रही है यह घड़ी यह जो नया एहसास है अजनबी है अजनबी सुना है मन वीरान है मेरा जहां आज क्यूं यादों में है डूबा दिल ना आ रहा है बाज क्यूं नजरें कर रही है इज़हार दिल में दबा है राज क्यूं कहने थे जो लफ्ज़ बदला है हर अल्फाज क्यूं सर्दियों की धूप में भी इतनी धुंध छाई आज क्यूँ सर्दियों ने ओढ़ ली है धूप की चादर अभी धूप है आँगन में उतरी बन के दुल्हन आज क्यूँ धीमी-धीमी उजली-उजली महकती है आज ... »

Marta kishan

मरता किसान जमीं को खोदकर अपना आसमान ढूंढते है पसीने की हर एक बूँद से अनाज उगाते है सबके मोहताज होने के बाद भी यह किसान हम सब की भूख मिटा जाते है सूखापन जमीं के साथ-साथ इनके जीवन में भी आ जाता मेघ के इंतजार में यह जवान कभी बुढ़ा भी हो जाता अपना स्वार्थ कभी न देखकर यह हमारी भूख मिटाकर खुद भूखा ही मर जाता पानी की याद में यह अपनी नैना मूंदते है जमीं को खोदकर अपना आसमान ढूंढते है धरती का सीना चीर यह जी... »

माँ की ममता

ममता के मन्दिर की जो मूरत है,दिखने मे बड़ी भोली सूरत है उस माँ को प्रणाम, माँ के चरणों मे प्रणाम। सूना-सूना लगता हे उसके बिना घर-आँगन, खुद से भी ज्यादा करती हे अपनों का लालन-पालन । जब भी माथे पे हाथ फिरौते-फिरौते अपनी गोदी में सुलाती, मीठी-मीठी नींद मे सुलाने नींदया रानी आ जाती। जब भी बेखबर भूख लगती अपने हाथ का बना खाना अपने लाड़ले को अपने हाथों से खिलाती, स्वाद उसमे ममतामयी आता सरजीवन बूँटी लगती उस... »

ममता

ये पेशानी पे जो लकीरें सी खिंची हुईं है, आँखों के तले बेनूर रातें सी बिछीं हुईं हैं, ये जो कांपते हाथों में काँच की चूड़ियाँ हैं, ऐश-ओ-आराम से जो ताउम्र की दूरियाँ हैं, ये जो मुस्कुराते होंठ हैं, दर्द को दबाए हुए, सीने में तमन्नाओं की तुर्बतें छुपाए हुए, ये जो साड़ियों के कोने कोने हैं फटे हुए, सालों साल से बस तीन रंगों में बँटे हुए, ये जो हाथों में गर्म दूध का इक गिलास है, बूढ़ी आँखों की लौ में भ... »

लक्ष्मण और मेघनाद का युद्ध

लक्ष्मण और मेघनाद का युद्ध आ गया अंततः वह भी क्षण आरंभ हुआ समर भीषण। दो वीर अडिग, अटल वीरत्व था साक्ष्य धरा का तत्व तत्व। एक ओर अहीश स्वयं लक्ष्मण है मही सकल टिकी जिनके फण। डटे सामने मेघनाद ले शुक्र से शिक्षा का प्रसाद। एक इंद्र जयी एक सूर्य वंश दोनों ही में क्षत्रीय अंश। वाणों में पावक सदृश घात नैत्रों में जैसे रक्तपात। तीरों से तीर प्रचण्ड लड़े सब देव असुर थे स्तब्ध खड़े। न कोई आधिक न कोई कमतर दोन... »

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