“यकीं “

यूँ तो बीत गये कई पल बिन तेरे भी_
पर संग तेरे बीते वो अनमोल पल भुलाये नहीं भूलते_

ताजिंदगी तुझे चाहने की रज़ामंदी हैं इस दिल की_
मगर वफ़ा का तेरी मुझे यकीं के इस्बात नहीं मिलते_

यकीं करूँ तो कैसे-? लबों पर तेरे लफ़्ज़ ठहरते ही नहीं_
उन पर पाक़ सी तेरी चाहत के एहसास नहीं मिलते_

फिर तोहमत-ए-बेवफाई हम पर कैसी_?
वफ़ा ढूँढती नज़रों को तेरे निशां नहीं मिलते_
यूंँ ही मोहब्बत के मेरी तुम्हें रूह में अपनी रेशा नहीं मिलते_
-PRAGYA-

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