अस्थिर

शीर्षक – अस्थिर

जो सोचती हूँ अपने बारे में
शायद किसी को समझा पाऊँ,

मैं वो पानी की बूंद हूँ जो
आँखों से आँसू बनकर छलक जाऊँ

तस्वीर बनाना आसान हैं किसी की
कोशिश करती हूँ
उसकी भावनाओं को समझ पाऊँ,

मंज़िल हैं इतनी दूर बनायीं
इस मोड़ पर शायद ही कभी लौट पाऊँ

ना करना विश्वास मुझ पर कभी
मैं वो ख़्वाब हूँ जो आँख खुलते ही बदल जाऊँ

तमन्ना रखते हैं जिन चाँद-तारों को छूने की
उन्हें जमीं पर रहकर हासिल कर पाऊँ

मेरी ज़िंदगी हैं वक़्त की तरह
शायद ही किसी के लिए ठहर पाऊँ,

कोशिश करती हूँ उन पुरानी यादों को ज़िंदा रख पाऊँ,

जिन राहों में खोई हैं ज़िंदगी
उन्हें अपनी मंज़िलो से मिला पाऊँ,

जो सोचती हूँ अपने बारे में
शायद किसी को समझा पाऊँ ।

Previous Poem
Next Poem

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

2 Comments

  1. राही अंजाना - June 6, 2018, 10:17 am

    वाह

  2. Mithilesh Rai - June 6, 2018, 9:36 pm

    Very nice

Leave a Reply