वक़्त

गुजरे वक़्त की स्याही पन्नो पे रहती काबिज़
अब के दौर की दास्ताँ को कोई कलम न दे

– राजेश ”अरमान”

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हर निभाने के दस्तूर क़र्ज़ है मुझ पे गोया रसीद पे किया कोई दस्तखत हूँ मैं राजेश'अरमान '

2 Comments

  1. देव कुमार - June 25, 2016, 3:08 pm

    asm

  2. Agatha - September 9, 2016, 4:51 pm

    You can definitely see your skills in the work you write. The arena hopes for more passionate writers like you who aren’t afraid to say how they believe. All the time go after your heart. “There are only two industries that refer to their customers as use2#.&s8r21; by Edward Tufte.

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