Anupam Mishra

  • रेत सी है अपनी ज़िन्दगी
    रेगिस्तान है ये दुनिया,
    रेत सी ढलती मचलती ज़िन्दगी
    कभी कुछ पैरों के निशान बनाती
    और फिर उसे स्वयं ही मिटा देती,
    कांटों को आसानी से पनाह देती
    फूलों को ये रेत हमेशा नकार देती,
    जो […]

    • बहुत खूबसूरत

    • अपने भाव की अभिव्यक्ति हेतु रेत और रेगिस्थान का अनूठा प्रयोग

    • सुंदर

    • Nice lines

    • शुक्रिया

    • कवि अनुपम जी की यह कविता जिंदगी को रेत का उपमान देकर चित्रात्मकता का सुंदर समावेश कर रही है। पाठक के मन में सहज की रेत में बन रहे पैरों के निशान चित्र बनकर उभर सकेंगे। फिर चलती हवा से वही निशान मिटने लगते हैं। यह कविता रेत को जीवन से जोड़ने का दुरूह कार्य है। “मृगतृष्णा उसे अपना पराव लगता है,” में दार्शनिकता की झलक भी है। सरल और सहज भाषा का प्रयोग है, “हर रोज़ कई कहानियों को रेत में कैद कर” में अनुप्रास का अलंकरण सुन्दर का को बढ़ा रहा है। बहुत खूब कविता

  • समन्दर का वो किनारा साथी है हमारा,
    जहां बैठ घंटों है वक्त हमने गुजारा,
    जैसे कि उनसे सदियों से नाता हो हमारा,
    बहुत बार तो मिलना नहीं हुआ है
    पर एक अनोखा रिश्ता सा कायम रहा है,
    मिलन का अनुभव हर बार उम […]

    • बहुत खूब

    • सुन्दर अभिव्यक्ति

    • कवि अनुपम जी द्वारा मानव मन के समुन्दर के किनारे से हुए जुड़ाव व समुद्र से दिल के रिश्ते का बखूबी चित्रण किया है। समुद्र के साथ बिताई यादें, समुद्र के साथ जुड़ी अनुभूति ने कवि की लेखनी में साहित्यानुराग पैदा किया है। कवि की यह कविता संवेदना के ठोस धरातल पर आधारित है। भाषागत सरलता आसानी ने कविता के कथ्य को पाठक तक ले जाने में सक्षम है।

  • किसी पिंजरे में कैद पंछी की तरह
    जैसे हमारा मन भी कैद हो गया है,
    सामने खुली चांदनी नजर आती है
    पर चार दिवारियों के बाहर नहीं निकल पाती,
    कुछ रस्मों की दीवारें हैं
    कुछ मर्यादाओं की रेखाएं हैं
    और कुछ ऊसूलों क […]

  • मैं हिन्दी हूं
    भारत की भक्त हिन्दी,
    संस्कृत मेरी जननी
    जिसमें अंकित है संस्कृति,
    उस संस्कृति की अब मैं उत्तराधिकारणी,
    उद्धरित हुई मेरे संग कई और बहने भी,
    उर्दू, पंजाबी, गुजराती, स […]

  • अजीब नौटंकी लगा रखी है जमाने ने
    मेरी विकलांगता पर खुल के हंसते हैं
    और अपनी कमी को दिन रात रोते हैं;
    गिर पड़ी जब ठोकर खाकर पत्थर से
    अंधा बताकर हमे मज़े लेते रहे खूब वे
    पर जब खुद अंधे हुए धूल में चलने से
    अपन […]

  • जीवन के इस सफर में टूटी हूं कई बार,
    घायल होकर दर्द में तड़पी हूं कई बार,
    पर हर दर्द का अपना हिसाब रहा,
    कोई बस तन पर एक दाग बन जमा रहा,
    और कोई टीस बनकर हृदय में चुभता रहा;
    कभी किसी पत्थर से हुई हमारी टकरार […]

  • सोच रही हूँ डालने को बालू समंदर में

    ताकि राह खुल जाये मुसाफिर की;

    अजीब दास्ता है ये, हो सकता नहीं ये संभव,

    पर है ये दुनिया असंभव को संभव करने वाली,

    हर सपने की है इसके पास चाभी निराली,

    लोगों ने तो च […]

  • पूर्ण समृद्ध न तो मैं हूं और न ही कोई अन्य,

    सर्वज्ञ तो इस जहाँ में कोई भी नहीं,
    हर किसी में कुछ न कुछ रिक्तता है जैसे,
    किसी भी ह्रदय का ज्ञान सम्पूर्ण नहीं,
    और वही खालीपन उसे प्रेम करना सिखाता है;
    उस र […]

  • हैं बहुत यहाँ एक से बढ़कर एक,
    है काबिलों की बस्ती ये जहाँ ,
    हैं कितने ही माहिर आये यहाँ
    और आकर चले गए न जाने कहाँ,
    कोई रहा कहाँ एक वक़्त जीकर यहाँ,
    हर किसीको आकर फिर जाना ही पड़ा,
    चाहे वो कितना भी माहिर […]

  • धूल, कंकड़, पत्थर, पहाड़ सबकी अपनी शान है,

    अपना मान है; हवा, जल, अग्नि सबकी अपनी पहचान है,

    कौन किससे भला समान है?

    समान कुछ नहीं यहां सबका बस अपना स्थान है

    छोटी सी झोपड़ी हो या ऊंची महल अट […]

  • हो चाहे कैसी भी घड़ी,
    आंधी तूफ़ान की लगी हो लड़ी,
    या मन को झुलसा रही हो अग्नि,
    डर हो यदि आगे हार जाने की,
    या फिर अपना सब खो देने की,
    शुरुआत जरूरी है;

    महल खड़ी करने को,
    नीव बेहद जरूरी है,
    मीठे फल खाने को
    बी […]