Rakesh Saxena

  • जब मिलीं दो युगल आँखें
    अधर पर मुस्कान धर के।
    गा उठे टूटे हृदय के
    भ्रमर मधुरिम तान भर के।

    सर झुकाकर दासता
    स्वीकार की अधिपत्य ने।
    गर्मजोशी जब परोसी
    अतिथि को आतिथ्य ने।

    यूँ लगा रूखे शहर में
    गाँव फिर से […]

  • मेरी गुड़िया रानी आखिर
    क्यों बैठी है गुमसुम होकर।
    हो उदास ये पूछ रहे हैं
    तेरे खिलौने कुछ कुछ रोकर।।
    कुछ खाओ और मुझे खिलाओ
    ‘चंदा मामा….’ गा-गाकर।
    तुम गाओ मैं नाचूँ संग- संग
    डम -डम ड्रम बजाकर ।। […]

    • छोटी सी गुड़िया रानी पर बहुत सुंदर कविता

    • कवि शास्त्री जी की बेहतरीन रचना। कवि ने प्यारी गुड़िया से जुड़ी बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति की है। कविता में कोमलता है, स्नेह की व्यापकता है औऱ बहुत मधुरता है। वाह
      चंदा मामा….’ गा-गाकर।
      तुम गाओ मैं नाचूँ संग- संग
      डम -डम ड्रम बजाकर ।।
      वश मुन्नी तू इतना कर दे।

    • मासूम गुड़िया की नटखट हरकतों पर बहुत सुंदर रचना

  • जब कभी भी टूटे ये तंद्रा तुम्हारी,
    जब लगे कि हैं तुम्हारे हाथ खाली!

    जब न सूझे ज़िन्दगी में राह तुमको,
    जब लगे कि छलते आये हो स्वयं को!

    जब भरोसा उठने लगे संसार से ,
    जब मिलें दुत्कार हर एक द्वार […]

  • दर्द बनके आँखो के किनारों से बहती है!
    बनकर दुआ के फूल होंठो से झरती है!!

    देती है तू सुकून मुझे माँ के आँचल सा!
    बनके क़भी फुहार सी दिल पे बरसती है!!

    खुशियाँ ज़ाहिर करने के तरीक़े हज़ार है!
    मेरे दर्द की गहराई […]

    • “होगी ग़ुलाम दुनिया ये पराई ज़बान की !
      मेरी मातृभाषा तू मेरे दिल में धड़कती है!!”
      _____मातृभाषा के बारे मे बहुत ही उत्कृष्ट रचना है सखी👌👌

    • देती है तू सुकून मुझे माँ के आँचल सा!
      बनके क़भी फुहार सी दिल पे बरसती है!!
      —— वाह, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति। यह कविता कवि की उच्चस्तरीय क्षमता को परिलक्षित कर रही है। कविता में एक एक विरल काव्य बोध है। अदभुत लय है और अनुपम भाव है।

    • सुंदर

    • जाऊँ कहीं भी मैं इस दुनिया जहान में!
      बन कर मेरी परछाईं मेरे साथ चलती हैं!!
      बहुत खूब

  • काँव काँव मत करना कौवे
    आँगन के पेड़ों में बैठ
    तेरा झूठ समझता हूं मैं
    सच में है भीतर तक पैठ।
    खाली-मूली मुझे ठगाकर
    इंतज़ार करवाता है,
    आता कोई नहीं कभी तू
    बस आंखें भरवाता है।
    जैसे जैसे दुनिया बदली
    झूठ लगा बढ़ने […]

  • मनुष्य हो तुम
    मनुष्यता सदैव पास रखो
    पाशविक वृत्तियों को
    पास आने न दो।
    दया का भाव रखो
    प्रेम की चाह रखो
    ठेस दूँ दूसरे को
    भाव आने न दो।
    दया पहचान है कि
    आप में मनुष्यता है
    अन्यथा फर्क क्या है
    फर्क का भान र […]

    • मनुष्यता सदैव पास रखो पाशविक वृत्तियों को
      पास आने न दो। दया का भाव रखो
      प्रेम की चाह रखो
      ______मनुष्यता के गुण समझाती हुई कवि सतीश जी की बहुत सुंदर प्रस्तुति। उत्तम लेखन

    • अति उत्तम रचना

    • बहुत खूब

    • अतिसुंदर भाव

  • आज रिश्तों में वो मिठास होती अगर रिश्तों को जोड़ने की कवायद उन्होंने हमारी तरह की होती।

  • फूलों के बिस्तर पर जन्मा पला बढ़ा उल्लासों में ।
    जिसको प्रचुर मिली सुविधाएं डूबा भोग विलासों में ।
    है भूमिका भाग्य की लेकिन अथक परिश्रम किए बिना,
    कोई नहीं महान बना है अब तक के इतिहासों में ।

    बड़े बड़ों के साथ […]

    • अतिसुंदर भाव

    • बहुत सुंदर एवम् यथार्थ परक रचना, लाजवाब अभिव्यक्ति

    • फूलों के बिस्तर पर जन्मा पला बढ़ा उल्लासों में ।
      जिसको प्रचुर मिली सुविधाएं डूबा भोग विलासों में ।
      है भूमिका भाग्य की लेकिन अथक परिश्रम किए बिना,
      कोई नहीं महान बना है अब तक के इतिहासों में ।
      ——– उत्तम भाव, उत्तम शिल्प, बेहतरीन अभिव्यक्ति है। आपके द्वारा लिखे गए गीत के भाव जीवन से जुड़े हुए हैं। अद्भुत

  • दिन भर हल चलाकर आये
    रात को खेत जानवरों भगाने गये
    क्या कभी किसी ने पूछा है
    कि अन्नदाता आप कब सोने गये?

  • जिस बंदे ने तुम्हारी परोसी थाली है,
    पर मजबूरन आज उसी की थाली खाली है।
    और समझो धूप बरसात गर्मी -ठण्डी उन दताओ की
    वरना राजनीति के चेहरे पर कालिख है।

    कल जो बादल वर्षा करते रहते थे
    कल तक जो तुमको थ […]

  • Vanshika Yadav changed their profile picture 1 week, 4 days ago

  • उसके खून से धरती माँ की चुनर लाल है,
    उस अन्नदाता से ही माँ के लाल लाल है।
    देखो आज माँ के कुछ लालो ने क्या हाल किया,
    कुछ लोगो से ही मेरा अन्नदाता आज बेहाल है।

  • मैं किसान हूं
    समझता हूं मैं अन्न की कीमत
    क्योंकि वो मैं ही हूं
    जो सींचता हूं फसल को
    अपने खून और पसीने से
    मरता हूं हर रोज
    अपने खेत की फ़सल को जिंदा रखने के लिये
    ताकि रहे न कोई भूखा
    कोई इस दुनिया में
    फि […]

  • जिंदगी थी बस
    चंद लम्हों की दास्ता
    रह गयी अधूरी फिर भी
    अनकही, अनसुनी

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