Satish Pandey

  • मेरे घर के सामने वाले पड़ोसी ने,
    अपने घर की इमारत ऊंची उठाई।
    घर उनका है मैं कुछ कह भी ना पाई,
    पर मेरे आंगन की धूप हवा और
    चांदनी ने मुझसे शिकायत लगाई,
    फ़िर मैंने बोला उनको,
    मत करो इमारत की इतनी लंबी परछाई […]

  • 15 जनवरी को हम थल सेना दिवस मनाएं,
    73वें थल सेना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
    तिरंगे की शान हैं सैनिक,
    भारत का मान हैं सैनिक,
    पूरी रात जो जागे सीमा पर,
    उसी का नाम है सैनिक।
    रात होते ही हम, सुकून से सो जात […]

  • हमर देशक सिपाही हमर शान छै।
    देशक रक्षा में जिनकर प्राण छै।।
    नञ भोजन केॅ कोनो फिकीर छै।
    नञ छाजन केॅ कोनो फिकीर छै।।
    जाड़ गरमी तऽ एकहि समान छै।
    हमर देशक सिपाही हमर शान छै।। देशक रक्षा में…. […]

    • थल सेना स्थापना दिवस पर कवि विनय चंद जी द्वारा प्रस्तुत देश प्रेम से भरपूर बहुत सुंदर मैथिली कविता
      “देशक रक्षा में तन मन प्राण छै
      हिनकर बलिदानक नञ कोनो मोल छै।”

  • फेंक रहे थे जब तुम खाना,
    मैं भोजन की आस में थी।
    रोटी संग सब्जी जी भी है क्या,
    मैं वहीं पास में थी।
    तुमने शायद देखा ना होगा,
    मैं काले मैले लिबास में थी।
    तुम तो बैठे थे कार में अपनी,
    मैं वहीं अंधकार […]

  • धीमी-धीमी धूप संग में,
    मीठी-मीठी खुशियां लाई।
    तिल, गज्जक की खुशबू लेकर,
    सर्दी में संक्रान्ति आई।
    मकर संक्रान्ति मनाना है,
    गंगा जी में नहाना है
    गंगा जी ना जा पाओ तो,
    घर में जरूर नहाना है,
    सर्दी है तो हुआ […]

    • धीमी-धीमी धूप संग में,
      मीठी-मीठी खुशियां लाई।
      तिल, गज्जक की खुशबू लेकर,
      सर्दी में संक्रान्ति आई।
      — मकर सक्रांति पर कवि गीता जी की बहुत सुंदर और बेहतरीन रचना है यह। बहुत खूब।

    • कविता की सुंदर समीक्षा हेतु आपका हार्दिक आभार सतीश जी , बहुत-बहुत धन्यवाद।

    • बहुत खूब बहिन
      मगर चूरा दही तो भूल गई
      मकर संक्रांति संग खिचड़ी की बहुत बहुत बधाईयाँ

      • सादर धन्यवाद भाई जी 🙏
        मकर सक्रांति की बहुत-बहुत बधाई

  • काली रात बीत गई, नई सुबह आई है |
    शुभ हुआ अशुभ पर भारी मंगल बेला आई है |
    पौष माह की सर्द रातों का चंद्रमा, अब माघ माह में आया है |
    सूर्य ने भी करवट बदली मकर संक्रांति की बेला पर, उत्तर दिशा की ओर निकला आज अपना तेज लेकर है |

  • खुशियाँ अपार है
    प्यार का त्योहार है।
    वेहरे बीच आग जली
    लोहड़ी की बहार है।।
    गैया का गोबर पाथ-पाथ
    पाथी लिया बनाय।
    सुक्खा लक्कड़ काट-काट
    लोहड़ी लिया सजाय ।।
    घच्चक मूंगफली रेवड़ी
    संग खिल्लां का भण्डार […]

    • “जाड़े में अमृत है अग्नि ये कहते वेद-पुराण है।
      ‘विनयचंद ‘त्योहार नहीं ये अग्नि का सम्मान है।।”
      लोहड़ी पर्व पर अग्नि जलाने की प्रथा को सम्मान रुप में दर्शाती हुई बहुत सुन्दर कविता

    • खुशियाँ अपार है
      प्यार का त्योहार है।
      वेहरे बीच आग जली
      लोहड़ी की बहार है।।
      —– बहुत खूब, लोहड़ी को हार्दिक शुभकामनाएं

    • बहुत खूब

  • क्या हुआ..
    आज मौसम को,
    बादल ही बादल हैं गगन में,
    सूरज भी नहीं दिखा,
    सर्दी बढ़ती ही जा रही
    जाने क्या है इसके मन में,
    धूप का ना नामो-निशां
    कहां छिपी हैं सूर्य-रश्मियां,
    थोड़ी सी तपन दे जाती
    इस ठंडी-ठ […]

  • थक चुका हू माँ
    मुझे सोने दे
    इस झूठे दुनिया से
    पक चुका हू
    मुझे अपने साथ ले ले

    स्वार्थ से चलते लोग
    मुखौटे पहने लोग
    सरल पेड़ कटते जाते है
    सरलता और मूर्खता मे कोई भेद नहीं है

    दुन […]

  • बेरोज़गारी बढ़ती ही जा रही है,
    सुरसा के मुख सम खुलती ही जा रही है।
    चयन हुआ पर नियुक्ति नहीं है,
    युवाओं की प्रतीक्षा बढ़ती ही जा रही है।
    दो-दो वर्ष से प्रतीक्षा कर रहे युवा,
    अब तो यह प्रतीक्षा […]

  • ढोल बजाकर आग जला कर,
    आओ लोहड़ी मनाएं
    तिल गुड़ की बर्फी बना कर,
    सब मिलजुल कर खाएं
    सरसों का साग और मक्का की रोटी
    मक्खन संग खाओ, स्वादिष्ट बड़ी होती
    रंग बिरंगी पतंग उड़ाएं
    मिल-जुल कर त्यौह […]

  • वो पुरानी गिटार पुरानी बाइक
    वो गली वो नुक्कर वो चौबारे
    वो बेहतर ज़िन्दगी बनाने के सपने

    कोई छीन नहीं सकता वोह जज़्बा आगे आने का
    वो खुली आँखों के सपने
    वो रात के तारे गिनने के दिन

    आज अपार्टमेंट थोड़ा बड़ा ही ह […]

  • I still go to the place where we met
    Blocked in facebook whatsup but
    Still hopes for the best

    You have moved on
    But still i wait for you
    Those beaches are having chaos of others
    Still i could see us in […]

  • कविता- क्या खोज रहे हो
    ——————————–
    क्या खोज रहे हो,
    कहाँ भटक रहे हो,
    अंदर सुख हैं-
    बाहर सुख नहीं हैं
    खुद को मजबूत बना
    हरदम लड़ अपने से,
    जिस दिन विजय तू पायेगा,
    ज्ञाने […]

    • अतिसुंदर रचना

    • ऋषि जी आपके भाव सचमुच उच्चस्तरीय हैं। आपकी संवेदना की जड़ बहुत गहरी है। मैं चाहता हूँ कि आपकी लेखनी काफी ऊँचा उठे।

      • उत्साहवर्धन के लिए समीक्षा के लिए हृदय के संपूर्ण गहराई से आपका आभार

    • “मन मति मद चित्त रूह पर उस दिन ब्रह्म समान हो जाएगा,”
      अनुप्रास अलंकार से सुसज्जित बहुत ही उत्कृष्ट पंक्तियां। ज्ञान को समर्पित बहुत सुंदर रचना

  • कभी कोई कांटे बिछा दे राहों में,
    कांटे चुन-चुन के दूर कर दो।
    इस तरह बढ़ाओ आत्म-बल,
    कि अरि के स्वप्न चूर कर दो।
    अन्धकार कर दे कोई राहों में गर,
    तो जला मशाल तिमिर दूर कर दो।
    प्रतिकूल […]

    • बहुत खूब

    • वाह बहुत सुंदर 👌👌👌

    • कभी कोई कांटे बिछा दे राहों में,
      कांटे चुन-चुन के दूर कर दो।
      इस तरह बढ़ाओ आत्म-बल,
      कि अरि के स्वप्न चूर कर दो।
      — कवि गीता जी यह प्रखर रचना है। अपने आत्मबल को ऊंचा रखकर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी गई है। कविता के भाव भी चिंतन के नये रचनात्मक सतह पर कविता को गढ़ने के यत्न से संबंधित है। बहुत खूब

      • आपकी इतनी अच्छी समीक्षा हेतु धन्यवाद शब्द कम पड़ रहे हैं सर। प्रेरणस्रोत बनी समीक्षा हेतु आपका हार्दिक आभार सतीश जी

  • ये सर्दी का मौसम,
    ये कोहरे का नज़ारा
    आज है ये आग्रह हमारा
    कोहरे में डूबी,
    यह सुन्दर-सुन्दर सुबह
    जी भर के जी लें,
    आओ ना एक कप चाय,
    क्यूं ना साथ-साथ पी लें..
    _____✍️गीता

  • अच्छे लोगों का,
    अपनी ज़िन्दगी में आना,
    सौभाग्य कहलाए
    उन्हें संभाल कर रखना,
    कहीं जाने ना देना
    हमारी योग्यता कहलाए।
    अनेक कलाएं हैं इस जहां में,
    सबसे सुंदर कला क्या है
    किसी के हृदय को छू लेना,
    अब इससे बड […]

  • ठंढी का मौसम आया है।
    संग मेरा मान बढ़ाया है ।।
    पुलकित होकर कहता चाय।
    बार – बार सब मांगते चाय।।
    कभी खुशी कम हो जाती है।
    जब बीच पकौड़ी आ जाती है।।
    झुंझला के रह जाता ये चाय।
    च्यवनप्राश क्यों आया भाय।।

  • ख़यालातों के बदलने से भी,
    नया दिन निकलता है।
    सुनो, सिर्फ सूरज चमकने से,
    ही सवेरा नहीं होता।
    हां ठंड में थोड़ी धूप भी जरूरी है,
    बादलों के आने से अंधेरा नहीं होता।।
    ____✍️गीता

  • अमृत बेला है अतिपावन।
    उठो रे तू छोड़ विभावन।।
    हरि का सुमिरन कर लो रे।
    सैर करो तू सुबह -सबेरे।।
    शीतल मंद हवा सुखदाई।
    योग प्रणायाम करो रे भाई।।
    तन -मन को निर्मल कर लो।
    मीठी वाणी मुख से बोलो।।
    कर्मशील […]

    • “कर्मशील बन रोजगार करो।
      दीनन हित परोपकार करो।।
      मानव जनम न बेकार करो।
      ‘विनयचंद’ भव पार करो।।”
      कवि शास्त्री जी की बहुत ही बेहतरीन पंक्तियाँ और उम्दा कविता है यह, यह कविता प्रेरणात्मक काव्य-बोध का निरंतर विस्तार करने में सक्षम है।

    • “अमृत बेला है अतिपावन। उठो रे तू छोड़ विभावन।।
      हरि का सुमिरन कर लो रे।सैर करो तू सुबह -सबेरे।।”
      कहते हैं कि सुबह सुबह प्रभु अमृत वर्षा करते हैं,तो उस बेला में यदि सुबह की सैर की जाए और प्रभु भजन किया जाए तो यह सेहत के लिए वरदान समान है। इसी कथन को समझाती हुई कवि विनय चंद जी की बहुत सुंदर कविता

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