Poems

या रब्ब दुश्मनों को सलामत रखे सदा

या रब्ब दुश्मनों को सलामत रखे सदा
न जाने कब आरज़ू क़त्ल की मचल जाये
राजेश’अरमान’

अंधेरों में वो नज़र

अंधेरों में वो नज़र आते है
उजालों में जो ठहर जाते है
चाक रखते है दामन अपना
पर महफ़िलों में संवर जाते है
राजेश’अरमान’

अक्स आईने में दिखता

अक्स आईने में दिखता तो जरूर है
हम ही तोहमत लगा जाते है आईने पे
राजेश’अरमान’

मसला सिर्फ इतना है

मसला सिर्फ इतना है
वो समझते नहीं मुझे
गर समझते तो इक नया
मसला खड़ा होता
ठीक से नहीं समझते
इस ठीक से समझने की
कोई परिभाषा नहीं है
अंदर से तालमेल की
कोई अभिलाषा नहीं है
उम्र गुजर जाती समझने में
जीने के लिए उम्र
कोई उधार नहीं देता
कुछ लम्हे इक दूजे से
उधार लिए थे
जिसका सूद न तुम चूका पाये
न मैं चूका पाया
बस बढ़ता जा रहा है सूद
काश फासलों में
कुछ तालमेल होता
छोटी छोटी बातों में
जीवन का खेल होता
मसला सिर्फ इतना है
राजेश’अरमान’

बारिश की बूंदो की

बारिश की बूंदो की
हल्की हल्की आवाज़
कानो में रस घोलते
जेहन में उतर जाती है
कौंधती बिजलियाँ कुछ
ठक ठक सी दस्तक
देती है मन के कोने में
जिस कोने को बंद दरवाज़ा
बना के रखा है वक़्त ने
दरवाज़ा कभी खुलता तो
कभी फस जाता है चौखट में
हवाएँ भी बारिश में कुछ
अल्हड हो जाती है
चलती है जैसे
बारिश उन्हें जवाँ कर गई
इन ठंडी हवाओं से
लिपट कर सब बंद दरवाज़े
खुल जाते है
प्रकृति की इस छटा
से लिपटने को
राजेश’अरमान’

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