Poems

कुछ परछाइयाँ

कुछ परछाइयाँ सी चलती है मेरे पीछे ,
वक़्त भी बहरूपिया होता है गुमाँ न था
राजेश’अरमान’

ਮੇਰੇ ਇਸ਼ਕੇ ਦੀ ਹੱਟੀ

ਮੇਰੇ ਇਸ਼ਕੇ ਦੀ ਹੱਟੀ

ਬਸ ਮਨ ਬਿਕਦਾ

 ਮੈਂ ਹਾ

ਮਨ ਦਾ ਵਪਾਰੀ

ਮੇਰਾ ਮਨ

ਮਨ ਹੀ ਰਿਸਦਾ

कभी मन करता है

कभी मन करता है
फिर से दुनिया को
औरों की नज़र से देखूँ
शायद मेरी नज़र में
कोई भ्रान्ति दोष हो
एक बार देखा
जब दुनिया को
दूसरी नज़र से
लगा आँखों पे
कोई चाबुक सा पड़ा
जिसके दर्द से
आज भी कराह रहा हूँ
राजेश’अरमान’

वोह दर्द

आँखों से जो बह निकले ,

                              वोह दर्द ज़रा से हल्के थे

       जो दिल ही दिल में द़फन हुए ,

                              वोह दर्द यूई के अपने थे  

                                                                     …… यूई

गहरे राज़

गहरे राज़ छुपे है अपनी ही साँसों में
लो तो ठंडी छोड़ों तो गर्म -गर्म
राजेश’अरमान’

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