Poems

“ना पा सका “

“ना पा सका “

ღ_ना ख़ुदी को पा सका, ना ख़ुदा को पा सका;
इस तरह से गुम हुआ, मैं मुझे ना पा सका!
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जिस मोड़ पे जुदा हुआ, तू हाथ मेरा छोड़ के;
मैं वहीँ खड़ा रहा, कि फिर कहीं ना जा सका!
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मुझसे इतर भला मेरे, अक्स का वजूद क्या;
जो रौशनी ही ना रही, साया भला कहाँ रहा!
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साथ है तो अक्स है, जुदा हुआ तो क्या रहा;
अरे मैं ही ग़र ना रहा, अक्स फिर कहाँ रहा!
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मेरे अक्स, पे ही मेरे, क़त्ल का इल्ज़ाम है;
जो आईना गवाह था, वो आईना तो तू रहा!
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अब ऐ मेरे हमनवा, ये फ़ैसला तुझ पर रहा;
कि दोनों ही का साथ दो, या कहो अलविदा!!…#अक्स
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26/11 के शहीदों को नमन, श्रद्धांजलि

26/11 के शहीदों को नमन, श्रद्धांजलि

मुश्किल है उस समय को याद करना
याद फिर भी आ जाती है

रोते तड़पते लोगो की तस्वीर सामने आ जाती है
आतंक के शैतानो को सबक अपने सिखाया है

अपनी जान देकर भी कइयों की जान बचाई है
२६/११ की रात्रि को मुम्बई मई मे ताकत जगाई है

२६/११ के शहीदों को नमन, श्रद्धांजलि.

मुक्तक

हो कर दूर तुमसे मैं जाऊंगा कहाँ?
तेरे बिना मंजिल को पाऊंगा कहाँ?
दर्द चुभ रहें हैं साँसों में महादेव,
अश्कों को दामन में छुपाऊंगा कहाँ?

मुक्तककार- #महादेव’ (मात्रा भार 22)

Those days are gone….

Those days are gone….

The days are gone,
When we used to play in a small veranda which looked like a large playground.
The days are gone,
When we used to share our lunch-box in each and every corner of the classroom, the happiness of which was more than anything.
The days are gone,
When the bicycle ride felt like a flight.
The days are gone, when a single penny would make us more happy than the big notes.
The days are gone,
When we were free to do anything and everything that made us happy.
The days are gone,
When everything looked easy and joyous.
The days are gone,
When you were sad and crying and at that moment there was someone behind you, who would make you happy.
But the experience of those days always makes me happy, makes me hopeful, and forces me to try to recreate those moments.
-Manish Upadhyay

आग का दरिया…

शमा ने परवाने की क्यों राख मांग दी,
जलते हुए परवाने ने भी फिर आग लांघ दी,
ये देखते हुए सिख लो अब तुम भी एक सबक,
सिर्फ शमा के विश्वास को परवाने ने जान दी।

सब जानता हूँ आग है अक्सर ही आगे इस डगर,
तो भी दुब जाता हूँ प्रेम में खो के क्यों मैं मगर,
विश्वास कर या फिर हो कर लाचार मैं भी यहाँ,
क्यों आता नहीं फिर मुझे शमा परवाने का विचार।

सीख के भी कभी इंसान मानता ही तो नहीं,
प्रेम और विश्वास में फर्क जानता भी तो नहीं,
काट के सर किसीका लाश पे होकर खड़े,
खुद की गलती को भी कभी पहचानता तो नहीं।

यही सब सोच मैंने अपनी भाषा बदल दी,
जितनी भी हो सकी अभिलाषा बदल दी,
और जुटा ली पूरी हिम्मत सामना करने को,
तो मुश्किल ने जिंदगी संग मिल परिभाषा बदल दी।

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