Poems

बारिश का इंतज़ार

लगाकर टकटकी मैं किसी के इंतज़ार बैठा हूँ,
भिगा देगी जो मुझ किसान की धरती मैं उसी के एहतराम में बैठा हूँ,
बेसर्ब बंज़र सी पड़ी है मेरे खेतों की मिट्टी,
मैं आँखों में हरियाले ख़्वाबों के मन्ज़र तमाम लिए बैठा हूँ॥
राही (अंजाना)

सूखी धरती सूना आसमान

सूखी धरती सूना आसमान

सूखी धरती सूना आसमान,

सूने-सूने किसानों के  अरमान,

सूख गयी है डाली-डाली ,

खेतों में नहीं  हरियाली,

खग-विहग या  हो माली,

कर रहे घरों  को खाली,

अन्नदाता किसान हमारा,

खेत-खलियान है उसका सहारा,

मूक खड़ा  ये  सोच रहा है,

काश  आँखों में हो  इतना पानी,

धरा को दे  देदूँ मैं हरियाली,

अपलक आसमान निहार,

बरखा की करे गुहार,

आ जा काले बादल आ,

बरखा रानी की पड़े फुहार,

धरती मांँ का हो ऋंगार,

हम मानव हैं बहुत नादान,

करते प्रकृति से छेड़छाड़,

माना  असंवेदनशील हैं हम मानव,

पर तुम तो हो पिता समान,

बदरा-बिजली लाओ आसमान,

बरखा बिन है कण-कण बेहाल,

ताल-तलैया सूख रहें हैं,

भँवरे, मेंढक, तितली, कोयल,

मोर, पपीहा सब कर रहे पुकार,

आओ बरखा रानी आओ,

जीवन में हरियाली लाओ,

सूखी धरती सूना आसमान,

सूने-सूने किसानों के अरमान ।।
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SHAYRI

बड़े से बड़े मुकाम में भी  कोई बल नहीं।

अगर जिंदगी में सकून का कोई पल नहीं।

SHAYRI

जग में सारा का सारा ज्ञान लिखा हुआ कहां मिलता है।

ज्यादातर  ज्ञान तो  विचारों  में ही  छिपा हुआ मिलता है।

सच्ची राह पे अगर….

सच्ची राह पे अगर  तेरा  एक कदम भी नेकी से पड़ा है।

तो  अगले ही  कदम पे  तेरा रब तेरे साथ में खड़ा है।

 

उसकी  फिक्र का  दिखावा करने वाले तो गुम हो गये

लेकिन  सच्ची  फिक्र  वाला अभी  भी  उसके  साथ में खड़ा है।

 

ऩफरत के  जबरदस्त  हमलों से भी  वो कभी हुआ

जो कमयाब असर  अब प्रेम के अधभुत बाण से पड़ा है।

 

वो जिंदगी में  सकून कभी  किस तरह कमा सकता है

हमेशा से ही लालच का सिक्का जिसके मन में जड़ा है।

 

उद्दण्डता जो की थी पहले उसने वो अब माफ हो गई

क्योंकि अब वो  पक्केपन से  अपनी मर्यादा पे अड़ा है।

 

दोनों की परिसीमाऐं  काफी नज़दीक लगती हो लेकिन

बेवकूफी और बेकसूरी  में फर्क तो वाकई बहुत बड़ा है।

 

वो तो जिंदगी में भी कभी  मुश्किल ही  जाग पाएगा

अलार्म के बिना  जो आँख खुलने पे भी सोया पड़ा है।

 

कारीगर  या  मालिक के हुक्म पे आखिर  मरना ही है

ये  मजदूर  का  नाम   मज़दूर   यूं  ही  थोड़े  पड़ा  है।

 

जग ने उसकी तनक़ीद करने में  कोई कसर छोड़ी

जग को सँवारने का भूत  जिस  बंदेके सिर पे  चढा है।

 

                                                                कुमार बन्टी

 

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