Poems

जीवन का आधार

लिपट कर एक बेल
एक पेड़ को,आधार पा गई थी
बहुत खुश थी सुंदर फूल उगाती थी
और गिराती थी जैसे पुष्प वर्षा हो
वो समझती थी की अब
आसान सफर है जिंदगी का
पेड़ की जड़ें भी गहरी है
और विशाल भी है ये
और मुझे इसने अपने चारों और
लिपटने की मौन अनुमति दे दी है
पर नियति और नीयत …
किसका बस चलता है
पेड़ का पालक मर गया
बेटे आये घर का बंटवारा हुआ
पेड़ बिच में आ रहा था
बोले काट दो
आरी चली कुल्हाड़ी चली
बेल बहुत परेशां थी
आज उसका आधार कट रहा था
उसका प्यार कट रहा था
बहुत सहने के बाद पेड़
लहराकर गिरा
पर बेल ने अपनी असीम ताकत लगा दी
पेड़ को गिरने से रोकने को
पर कुछ देर हवा में झूलने के बाद
पेड़ गिर पड़ा
और गिर पड़ी उसके उपर
वो बेल भी दोनों निष्प्राण थे
दोनों सूख गए पर सूखी बेल आज भी
लिपटी पड़ी है उस
बेजान पेड़ से….
?? जयहिंद ??

प्रस्तुति – रीता जयहिंद

बचपन की यादें

ऐ मेरे स्कूल मुझे,
जरा फिर से तो बुलाना…

कमीज के बटन
ऊपर नीचे लगाना,
वो अपने बाल
खुद न काढ़ पाना,
पी टी शूज को
चाक से चमकाना,
वो काले जूतों को
पैंट से पोंछते जाना…

? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
जरा फिर से तो बुलाना…

? ? ? ? ?

वो बड़े नाखुनों को
दांतों से चबाना,
और लेट आने पर
मैदान का चक्कर लगाना,
वो प्रेयर के समय
क्लास में ही रुक जाना,
पकड़े जाने पर
पेट दर्द का बहाना बनाना…

? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
जरा फिर से तो बुलाना…

? ? ? ? ?

वो टिन के डिब्बे को
फ़ुटबाल बनाना,
ठोकर मार मार कर
उसे घर तक ले जाना,
साथी के बैठने से पहले
बेंच सरकाना,
और उसके गिरने पे
जोर से खिलखिलाना…

? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
जरा फिर से तो बुलाना…

? ? ? ? ?

गुस्से में एक-दूसरे की
कमीज पे स्याही छिड़काना,
वो लीक करते पेन को
बालों से पोंछते जाना,
बाथरूम में सुतली बम पे
अगरबत्ती लगाकर छुपाना,
और उसके फटने पे
कितना मासूम बन जाना…

? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
जरा फिर से तो बुलाना…

? ? ? ? ?

वो Games Period
के लिए Sir को पटाना,
Unit Test को टालने के लिए
उनसे गिड़गिड़ाना,
जाड़ो में बाहर धूप में
Class लगवाना,
और उनसे घर-परिवार के
किस्से सुनते जाना…

? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
जरा फिर से तो बुलाना…

? ? ? ? ?

वो बेर वाली के बेर
चुपके से चुराना,
लाल–पीला चूरन खाकर
एक दूसरे को जीभ दिखाना,
खट्टी मीठी इमली देख
जमकर लार टपकाना,
साथी से आइसक्रीम खिलाने
की मिन्नतें करते जाना…

? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
जरा फिर से तो बुलाना…

? ? ? ? ?

वो लंच से पहले ही
टिफ़िन चट कर जाना,
अचार की खुशबू
पूरे Class में फैलाना,
वो पानी पीने में
जमकर देर लगाना,
बाथरूम में लिखे शब्दों को
बार-बार पढ़के सुनाना…

? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
जरा फिर से तो बुलाना…

? ? ? ? ?

वो Exam से पहले
गुरूजी के चक्कर लगाना,
लगातार बस Important
ही पूछते जाना,
वो उनका पूरी किताब में
निशान लगवाना,
और हमारा ढेर सारे Course
को देखकर सर चकराना…

? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
जरा फिर से तो बुलाना…

? ? ? ? ?

वो farewell पार्टी में
पेस्ट्री समोसे खाना,
और जूनियर लड़के का
ब्रेक डांस दिखाना,
वो टाइटल मिलने पे
हमारा तिलमिलाना,
वो साइंस वाली मैडम
पे लट्टू हो जाना…

? ऐ मेरे स्कूल मुझे,
जरा फिर से तो बुलाना…

??????

वो मेरे स्कूल का मुझे,
यहाँ तक पहुँचाना,
और मेरा खुद में खो
उसको भूल जाना,
बाजार में किसी
परिचित से टकराना,
वो जवान गुरूजी का??
बूढ़ा चेहरा सामने आना…
तुम सब अपने स्कूल
एक बार जरुर जाना…

?? जयहिंद ??

प्रस्तुति – रीता जयहिंद

नारी वर्णन

मयखाने में साक़ी जैसी
दीपक में बाती जैसी

नयनो में फैले काजल सी
बगिया में अमराई जैसी

बरगद की शीतल छाया-सी
बसन्त शोभित सुरभी जैसी

गीता कुरान की वाणी-सी
गंगा यमुना लहराती जैसी

बगीचे की हरि दूब जैसी
आँगन में हो तुलसी जैसी

आकाश में छाय बदल सी
शीतल बहती पुरवाई जैसी

फूलों की खिलती क्यारी सी
समुदर की गहराई जैसी

रंगों में इन्द्रधनुष जैसी
सावन में धार झरती जैसी

मौत में जीने की चाह सी
मृग में छिपी कस्तूरी जैसी

मन में रहती हिम शिला सी
हिमालय की उच्चाई जैसी

चुभती मन में काँटों जैसी
पूनम रात चांदनी जैसी

सजन मन छाय बात याद की
याद रहे परछाई जैसी

?? रीता जयहिंद ??

माता – पिता पर आधारित

दिल के एक कोने मे मन्दिर बना लो।
मात-पिता की मूरत उस मे बिठा लो।
दिया ना जलाओ पर गले से लगा लो।
आरती के बदले ,
कुछ उनकी सुनो ,
कुछ अपनी सुनाओ।
पहला भोग मात-पिता को लगा कर तो देखो।
इनके चरणों मे माथा झुका क़र तो देखो।
धर्म स्थलो पर जो मागने जाओगे।
अरे !!!
बिन मागे घर मे पाओगे ।।
जिस के घर मे माँ-बाप हसते है
प्रभु तो स्वयं ही उस घर मे बसते है..

?? जयहिंद ??

प्रस्तुति – रीता जयहिंद

मां की महिमा

कौन बिन माँ के जगत में जन्म पाया ,
देव से बढ़कर तुम्हारी मातृ माया ,
है नही ऋण मुक्त कोई मातृ से ,
जन्म चाहे सौ मिले जिस जाति से ,
दूसरा है रूप पत्नी का तुम्हारा ,
जो पुरुष का रात दिन बनती सहारा ,
सुख दुःख में है सदा संधर्ष करती ,
धर्म अपना मानकर अनुसरण करती ,
तू बहन है तीसरे परिवेश में ,
भ्रातृ की रक्षा करे परदेश मे ,
ले बहन का रूप जब आती धरा पर ,
भावनाये याद है राखी बराबर ।
एक तेरा रूप पुत्री में समाया ,
पितृ सुख है पिता मन में समाया ,
कौन तेरी रात दिन रक्षा करेगा ,
हो वरण कैसे पिता चिंता करेगा ।
वंश की उन्नति तुम्हारे योग से ,
नित्य समरसता तुम्हारे भोग से ,
तू सुधा सी धार बन जीवन निभाती ,
प्राण की बलि भी चढ़ा कर मुस्कुराती ।

?? जयहिंद ??

प्रस्तुति – रीता जयहिंद

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