Poems

ज़िद कभी न हारने की

ज़िद कभी न हारने की
वज़ह कभी बनती है हार की
राजेश’अरमान’

इधर आग लगी है

इधर आग लगी है बस्तिओं में
उधर जनाब तैर रहे है पानी में
राजेश’अरमान’

दर्द में भी अब

दर्द में भी अब मज़ा न रहा
क़ल्ब भी अब पाकीज़ा न रहा
परियों की कहानी पर भी यकीं था,
हक़ीक़त में अब मोज़ेजा न रहा
राजेश’अरमान’

कुछ तो हैरान होगी

कुछ तो हैरान होगी ज़िंदगी भी
जब हमने अपना मुँह मोड़ लिया
राजेश’अरमान’

बेवफा दिल

बेवफा दिल

बेवफा दिल

बेवफा ज़िन्दगी में किसी अजनबी से प्यार हो गया ,
मोहबत हुई उनसे इस कदर की ऐतबार हो गया ,
सुना था दुनिया में अक्सर की ये प्यार क्या है ,
किया जब दिल ने, मुझसे पूछो की ये बला क्या है,
मिले जब दिल कही उनसे तब लगा सदियों के फासले है ,
दिल के दिल से जुड़े कही तो कुछ फैसले है,
चाहा था क्या दिल ने और मिला क्या,
शायद उनके मेरे बीच यही सिलसिले है ,
यकीन था इस दिल में की हम इस जहान में मिलेंगे ,
मिला कुछ तो सही तो हम एक राह संग चलेंगे ,
जो चाहा इस दिल ने वो फिर कहा मिला ,
बेवफा ही था यह दिल जो फिर गला ,
इस ज़िन्दगी में फिर दर्द के सेवा कहा कुछ मिला ,
बस फिर चला था ये दिल ढूंढा फिर भी कहा कोई उनसा मिला ,
अधूरा था रहे गया , शायद यही था उनके और मेरा प्यार में।

निशित लोढ़ा

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