Poems

कदम रुकने से मंज़िल

कदम रुकने से मंज़िल कुछ और दूर हो जाती है
मुसाफिर की थकन से राह मजबूर हो जाती है
हौसलों की हवा से उड़े है जहाँ के गुब्बारे,
उड़ते गुब्बारों की दुनिया में हस्ती मशहूर हो जाती है
राजेश’अरमान’

खुद की भागम -भाग

खुद की भागम -भाग
उसपे रस्ते आग ही आग
कुछ शीतल भी है
अम्बर के नीचे
कुछ शांति भी है
अम्बर के नीचे
अपने ही हाथों से
हमने खुद मानव
से बदल कर बना दिया
मानवरूपी मशीन
जिसके हर कलपुर्जे
हमारी प्रगति तो दिखाते है
पर अंदर की घुटन को
बस हम हरदम छुपाते है
क्या फिर मशीन से मानव
बनना संभव नहीं है
यदि हो सके तो ढूंढे
खोई हुई ज़िंदगी को दुबारा
कहीं हमने खुद ही उसे
कहीं दबा कर तो
रख नहीं दिया है
हम सचमुच जी रहे है
या जीने की कोशिश कर रहे है
यदि कोशिश है तो फिर ज़िंदगी
दफ़न कर हम साँसें हवा में
बिखेर रहे है ,ले नहीं रहे
साँसें लेने से भी घुटन
सी होती है अब ,क्योकि
खुद की भागम -भाग
उसपे रस्ते आग ही आग
राजेश’अरमान’

कुछ तो दायरे हो

कुछ तो दायरे हो , जिसमे रहना जरूरी है
जिस के अंदर खुद को भी रखना जरूरी है

प्रगति के हम एक कारीगर है मगर
वक़्त के साथ कारीगर बदलते रहना भी जरूरी है

कुछ क़र्ज़ हमारे ऊपर खुद का भी है
अदा उसका होते रहना भी जरूरी है

अनंत है इच्छाए उस पर कई दौड़
कुछ दौड़ में पिछड़ते रहना भी जरूरी है

ज़िंदगीकी कोई डोर नहीं है तेरे हाथों में
हर साँसों को जीते रहना भी जरूरी है

राजेश’अरमान’

कभी मन करता है

कभी मन करता है
फिर से दुनिया को
औरों की नज़र से देखूँ
शायद मेरी नज़र में
कोई भ्रान्ति दोष हो
एक बार देखा
जब दुनिया को
दूसरी नज़र से
लगा आँखों पे
कोई चाबुक सा पड़ा
जिसके दर्द से
आज भी कराह रहा हूँ
राजेश’अरमान’

कुछ परछाइयाँ सी

कुछ परछाइयाँ सी चलती है मेरे पीछे ,
वक़्त भी बहरूपिया होता है गुमाँ न था
राजेश’अरमान’

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