Poems

जिनके आने से पहले

जिनके आने से पहले, मौसम का गुमाँ हो जाता था
आज वो खुद ही हो गए, इक मौसम की तरह
राजेश’अरमान’

इम्तिहाँ लेते है वो

इम्तिहाँ लेते है वो कुछ इस अंदाज़ से
आता हुआ जवाब भी हम भूल जाते है
राजेश’अरमान’

अब भी मेरा नाम

अब भी मेरा नाम उनके अपनों में शुमार है
उनके हाथों के पत्थर को मेरा इंतज़ार है

ये चादर जरा आहिस्ते से संभल कर ही हटाना
ये फूलों से नहीं ,चुभते काटों से सजी मजार है

वो नाम भी मेरा लेते है और कसम भी खाते है
हम तो पहलू में उसके मिटने को कब से तैयार है

यक़ीनन उसके इरादों पे कोई शक नहीं मुझे
भरे ज़ख्मों को भी हिला देंगे मुझे ऐतबार है

अभी तो इब्तिदा है तेरे सितम की ‘अरमान’
तेरे सहने को पड़े कतार में अभी गम हज़ार है

अब भी मेरा नाम उनके अपनों में शुमार है
उनके हाथों के पत्थर को मेरा इंतज़ार है

राजेश’अरमान’ २१/०४/2012

सब कुछ है जहाँ में

सब कुछ है जहाँ में ,बस यहाँ किल्लत कुछ और है
ज़िंदगी तुझे जीने के लिए ,बस जिल्लत का दौर है

आईने ने कब माफ़ की है ख़ता किसी गुनाहगार की
और हमें सच बोलते आईनों की इल्लत से बैर है

देखिये उस तरफ फिर कोई मकां जल रहा है
शायद वहीँ अपने अपने हिस्से की आदमियत का शोर है

हर्फ़ निकलते ही लब से, बन जाते है अफ़साने कई
कौन देखेगा यहाँ किस अफ़साने से मिटा कोई दौर है

चल कोई ऐसी फिज़ा इफ़्फ़त भरी तलाश करें ‘अरमान’
या तो पहले ही से फैला फिज़ाओं में हर तरफ जहर है

राजेश ‘अरमान’
इफ़्फ़त= शुद्धता, पवित्रता
इल्लत= दोष, बुरी आदत,

आराईश अपने अंदर

आराईश अपने अंदर की तो हम अब खो चुके है
तलाश आलम की करते फिरते रहने को नासबूर है

परस्तिश बन्दे की हो या फिर ख़ुदा की हो
बस कुछ न कुछ मांगने का अजीब सा दस्तूर ह

तिरा हर फैसला निकलता है सिर पे पत्थर की तरह
कोई मेरे हक़ में भी हो ,जिसे मैं भी कहूँ मंजूर है

या के इन परिंदो के आसमां में भी कोई पिंजरे न सजा दे
ताक के इनको उड़ता है कोई ,जो अपने पंख से मजबूर है

इस तस्सली के दरिया में कब तक रहे ‘अरमान’
मेरे हिस्से का भी बना कोई समुन्दर कहीं जरूर है

राजेश’अरमान’

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