Poems

मुझमे में हु कही…

मुझमे में हु कही…

आईना में अक्सर देखा खुद को जब मैंने कही ,
चहेरे पे चहेरा हर दम दीखता है ,

वो मासूमियत सा खिलखिलाता बचपन,
देखू कहा,अब तू बता, ऐ मन,ढूंढ़ता हरदम दीखता है ,

मंज़िल ऐ सफर ,न कोई फ़िक्र ,
वो पल-वो कल ,
वो साथ अपनों का, ढुंढू तो भी अब कहा मिलता है,

वक़्त की कीमत का उस समय एहसास न था,
आज कोडी-कोडी कमाने के लिए कोई मुझमे हर दम मिलता है,

चहेरे पे ढुंढू कहा वो हस्सी अपने बचपन की ,
अब तो मुस्कुराने में भी मन को सूनापन लगता है ,

जीना को ज़िन्दगी तो बहुत लम्बी दी, ऐ खुदा ,
पर सबसे बेहतर जीने में बचपन लगता है।

one of my best creations
dedicated,
Nishit Yogendra Lodha
kavishayari.blogspot.in
fb page-kavi shayar

मुझको तेरी जुदाई बेइंतहाँ सताती है

मुझको तेरी जुदाई बेइंतहाँ सताती है!
शामों-सहर मुझको तेरी याद रूलाती है!
बिखर रही है जिन्दगी दर्द के पायदानों पर,
अश्कों में तैरती मुझे मंजिल नजर आती है!

Composed By #महादेव

समस्या

#देश_में_विधवाओं_का_ये_कैसा_हो_रहा_सम्मान_है ,,
#लाखो_माएं_बेघर_और_बच्चे_अनाथ_है ,,
#द्वारिकाधीश_तेरी_नगरी_में_एक_गंभीर_समस्या_है ,,
#तेरी_गोपियाँ_कलियुग_में_हो_गयी_विधवा_है ………!!
……………………………………………~~**#चंद्रहास**~~

वो यादें

वो यादें

उनसे बिछड़े मुझे एक ज़माना बीत गया,
याद में उनके रहते एक अफ़साना बीत गया,
किताबो के पन्नें पलट गए हज़ार ज़िन्दगी के ,
पर साथ छूटे उनका मेरा ऐसा जैसे संसार मेरा वीराना बीत गया,

लिखी कहानी जो उन् हज़ार पन्नो पे वो शायद जमाना बीत गया,
पिके बेहटा हु अपने आप में कही .
याद में उनके रहता आज भी वो अफ़साना बीत गया ,
शायद ज़िन्दगी का एक पल और जैसा उनका दीवाना सा बीत गया।

निशित लोढ़ा

ये नज़ारे

ये नज़ारे
आसमान को ताकता ढूंढता में वो एक तारा,
न जाने कहा छुप बेहटा बादलो के बीच कही तो मुस्कुरा रहा है,
वो पंछी हर राह मुड़ता कही अपना रास्ता बना हवाओ के बीच चलता अपने घर उड़ता चला जा रहा है,
देखती नज़रे जहा दूर कही चलती दुनिया को,
अपनी मंज़िल की और बढ़ता जैसे कोई उन्हें जल्द अपने पास बुला रहा है,
बेहटा में कही गुनगुनाता देखता उन् नज़ारो को हलके हलके यादों के संग एक बात दिल में कही छुपाये ,
हाय मुस्कुरा रहा है,
देखो शायद मुस्कुरा रहा है।?
कवि एव पत्रकार-
निशित लोढ़ा?

Page 1445 of 1644«14431444144514461447»