Poems

समझाऊँगी क्या मैं तुझको
बतलाऊँगी क्या मैं तुझको !
कभी तो अपना जान तू मुझको
कभी तो अपना मान तू मुझको !
बस इतना-सा वादा कर दे
बस इतना-सा सच्चा कर दे !
मुझको तू अपने काबिल कर दे
मुझको तू इतना कामिल कर दे !

क्यों मिली नहीं रहमत तेरी
अब तक
क्या मेरी कोई भूल तेरे
दर मे गुनाह मुक़र्र हुई है !

क्यों खुदा तेरा दिल भी
बंजर-सा हुआ
क्या तेरा भी कोई अपना
बेईमान-सा हुआ !

मेरा छोटा सा संसार

आतंक फैला है इस दुनिया में

जैसे लगा आतंक का मेला।

झूठ इतना फैल गया,

जिससे सच खड़ा है, बेचारा अकेला।

लोग कहते है कि, आंतक हमे हटाना है

और अपने देश को, आतंक से मुक्त कराना है।

लेकिन कोई देश की बात न करके

क्या ये कहता है, कि मुझे तो बस

इस संसार को खुशहाल बनाना है।

अरे! अपने स्वार्थ के लिए जीना छोड़दो

मै तो पूछता हु, क्यो लड़ते हो सीमाओ पर?

क्या है शहर, क्या देश

क्या कभी हम गर्व से कह पायेंगे

कि ये संसार ही है, हम सबका एक घर।

मेरी आँखों में

जाने कब से हैं मेरी आँखों में,
ये ख्वाब किसके हैं मेरी आँखों में।
मैं तो सूखा हुआ सा दरिया था,
ये मौज किसकी है मेरी बाहों में।।
मैं तो सोया था तन्हा रातों में,
ये पाँव किसके हैं मेरे हाथों में।
यूँ तो रहता था सूने आँगन में,
ये बोल किसके हैं मेरे आँगन में।।
सूखा बादल था मैं तो राहों का,
ये बून्द किसकी है मेरी राहों में,
चुप ही रहते थे शब्द नज़्मों में,
ये होंठ किसके हैं मेरी ग़ज़लों में॥
राही (अंजाना)

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