Poems

आंधियो मेहमां बन

आंधियो मेहमां बन जब जी चाहे तुम आया करो
अर्ज़ बस इतनी तुम दरख्तो को न गिराया करो

तूफा तो हर तरफ हर जगह आते रहते है
अर्ज़ बस इतनी तुम कश्तियों को न डुबाया करो

मेरे दुश्मन तेरे क़त्ल से कब गुरेज मुझे
अर्ज़ बस इतनी क़त्ल करके खंजर न छोड़ जाया करो

तेरे वादे पे हर बार किया है ऐतबार मैंने
अर्ज़ बस इतनी कोई वादा तो निभाया करो

ज़िंदगी क्या करें कोई शिकवा तुझसे ‘अरमान’
अर्ज़ बस इतनी कभी खुल के मिल जाया करों

राजेश ‘अरमान’

इक गुमशुदा की तलाश

इक गुमशुदा की तलाश में तमाम उम्र गुजर गई
काश हम कुछ जान -पहचान खुद से पहले ही कर लेते

राजेश’अरमान’

आंसुओं का क्या है

आंसुओं का क्या है निकलते है फिर
कुछ बह जाते ,कुछ सूख जाते है

लफ्जों के जहर ही तकलीफ दे जाते है
लहूँ में घुल नसों में मुझसे तेज दौड़ जाते है

काश लम्हों की काट-छाँट का कोई हुनर होता
बदबूदार लम्हों के दफ़न का भी कोई हुनर होता

हर सहर लेके आती है साथ नई नई चिंगारियां
और हर शाम ढेर सा धुँआ आँखों में डाल सो जाती है

अपने ही आसपास बस इक खुद को ही ढूंढ़ता है मन
जैसे खुद ही अपने लिए अजनबी सा होके रह गया हूँ

आंसुओं का क्या है निकलते है फिर
कुछ बह जाते ,कुछ सूख जाते है

राजेश ‘अरमान’

जीवन सिर्फ जीवकोपार्जन

जीवन सिर्फ जीवकोपार्जन के लिए किया प्रयास नहीं है
जी सभी रहे है लेकिन जीने का एहसास नहीं है

सदियाँ बीती हवाओं की भी इस ज़माने की हवा लग गई है
दीपक हौसलों के बस साथ रखो फिर कोई मुश्किल खास नहीं है

न सुबह का वर्चस्व तो फिर कैसे हो सकता है रात का
जीवन कुछ और भी है , हर पल वनवास नहीं है

पिघलते आसमान से अपनी ज़मीं को रखना है तुमको दूर
अपने कर्मों से जीने से बड़ा संसार में कोई संन्यास नहीं है

जीवन सिर्फ जीवकोपार्जन के लिए किया प्रयास नहीं है
जी सभी रहे है लेकिन जीने का एहसास नहीं है

राजेश’अरमान’

इक बार मेरी सिसकती कलम

इक बार मेरी सिसकती कलम ने कोरे कागज़ पर लकीरें खीच दी
मैं सारी उम्र उसे जीवन रेखा ही समझता रह गया

इक बार मेरा हाथ उन लकीरों में पड़ गया
लगा सारी हाथ की रेखाएं हाथों से कागज़ पर गिर गयी है

इक बार इन लकीरों पर गलती से मेरा पाँव पड़ गया
एहसास किसी मुल्क को बाटती सरहद सा हुआ

इक बार मैंने उस कलम को फिर से हँसते हुए देखा
इक कोने पे बैठी लकीरें अब सिसकियाँ भर रही थी

राजेश ‘अरमान’१२/०५/२००५

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