Poems

गमछे रखकर के अपने कन्धों पर….

गमछे रखकर के अपने कन्धों पर….
गमछे रखकर के अपने कन्धों पर
बच्चे निकले हैं अपने धन्धों पर।

हर जगह पैसे की खातिर है गिरें
क्या तरस खाएं ऐसे अन्धों पर।

सारा दिन नेतागिरी खूब करी
और घर चलता रहा चन्दों पर।

अपना ईमान तक उतार आये
शर्म आती है ऐसे नंगों पर।

जितने अच्छे थे वो बुरे निकले
कैसे उंगली उठाएं गन्दों पर।

जिन्दगी कटती रही, छिलती रही
अपनी मजबूरियों के रन्दों पर।
……..सतीश कसेरा

कुछ लफ़्ज़ ठहरा रखे हैं कागज पर

कुछ लफ़्ज़ ठहरा रखे हैं कागज पर

कुछ लफ़्ज़ ठहरा रखे हैं कागज पर
क्या पता कभी कोई कविता बन जायें
कुछ दिनों को भी जोड रखा है
शायद कहीं ये भी कभी जिंदगी बन जायें

मेरी लाडली री बनी

मेरी लाडली री बनी है तारों की तू रानी
नील गगन पर बादल डोले, डोले हर इक तारा
चांद के अंदर बढ़िया डोले ठुमक-ठुमक दर-द्वारा
कमला गाए बिमला गाए, गाए कुनबा सारा
घूँघट काढ़ के गुड़िया गाए, झूले  गुड्डा प्यारा
बटलर नाचे, बैरा नाचे, नाचे मोटी आया
काले साहब का टोपा नाचे, गोरी  मेम का साया
मेरी लाडली री बनी है तारों की तू रानी
एक मुलाकात की तमन्ना मे…

एक मुलाकात की तमन्ना मे…

आपकी यादो को अश्कों में मिला कर पीते रहे
एक मुलाकात की तमन्ना मे हम जीते रहे

आप हमारी हकीकत तो बन न सके
ख्वाबों में ही सही हम मगर मिलते रहे

आप से ही चैन ओ सुकून वाबस्ता दिल का
बिन आपके जिंदगी क्या, बस जीते रहे

सावन, सावन सा नहीं इस तनहाई के मौसम में
हम आपको याद करते रहे और बादल बरसते रहे

जब देखा पीछे मुडकर हमने आपकी आस में
एक सूना रास्ता पाया, जिस पर तनहा हम चलते रहे

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विश्वशांति

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