Poems

छलांग

गिर गया तो क्या हुआ
पाना मुकाम अभी बाकी है
जान भर ली है पैरों मे मैंने
आसमां तक ऊँची छलांग अभी बाकी है.

जो भी मिली

जो भी मिली

जो भी मिली रातें ग़ज़ब रोशन
वो बेहया सब बेनक़ाब निकली

उजलें इमलों में है ख़ुशी मतलबी
ख़ामोश वफ़ाई बेचिराग निकली

कोई जुदा हुई तोडा दम किसीने
हर आरज़ू कमनसीब निकली

लगी मेहंदी वो हाथों की लकीरों को
आँखों से ख़ुशी बेहिसाब निकली

बन के आशिक़ भरी ज़ेबों को मिले
बाजारेग़म की अर्थी तन्हा निकली

Ghazal

जिनके अल्फाज़ आईने के तरह साफ होते हैं,
जमाने की हवा उनके खिलाफ होते हैं।
औरों के काम को वहीं आग का नाम देते,
जिनके आवाजों में अक्सर उबलते भाप होते हैं।
जंगल का नाग हो तो रास्ता बदल लू,
वो कितना बचें जिनके घर विषैले सांप होते हैं।
जमाने से सच बोलने के लिए कसमें वहीं उठवाते,
जो अपने एक झूठ पर कई झूठ का हिजाब देते हैं

कामना

हे अहोई अष्टमी माता
अपने पुत्र के लिए मै
करती हूँ तुमसे यही कामना
रक्षा उसकी सदा करना
मुश्किलों से हो जब भी उसका सामना

हे अहोई अष्टमी माता
अपने पुत्र के लिए मै
करती हूँ तुमसे यही कामना.

सदा सुखी वो रहे
कमी ना हो खान पान की
राह उसे उज्वल देना
जग ख्याति हो मान सम्मान की.

हे अहोई अष्टमी माता………
………………
लम्बी उम्र वो जिये
देना उसे अच्छा स्वास्थ्य
माँ मै चाहूँ तुमसे यही
तुम हो मेरी आराध्य.

हे अहोई अष्टमी माता…. ..
………..
सुन्दर चरित्र, स्वच्छ वाणी
अच्छी मिले उसे संगती
कृपा माँ उसपर अपनी करना
देना उसे तीव्र सम्मति.

हे अहोई अष्टमी माता…….

चौदहवीं का चाँद

मेरे महबूब के हुस्न की जो बात है।
चौदहवीं के चांद तेरी क्या बिसात है।।

चांद भी देख गश खाएगा,
मेरे महबूब को देख शर्माएगा।
मेरे महबूब से हंसीन ये रात है।
चौदहवीं के चांद तेरी क्या बिसात है।।

ले अंगड़ाई, दिन निकल आए,
खोल दे गेसूं, शाम ढल जाए।
झटक दें जुल्फें तो होती बरसात है।
चौदहवीं के चांद तेरी क्या बिसात है।।

चांद तू क्यों उखड़ा उखड़ा है,
मेरे महबूब की चूड़ी का टुकड़ा है।
खनकती चूड़ियां तो मचलते जज़्बात हैं।
चौदहवीं के चांद तेरी क्या बिसात है।।

देवेश साखरे ‘देव’

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