Poems

सर्द रातों का सितम कौन सहे

सर्द रातों का सितम कौन सहे
इस हाल में तनहा कोई कैसे रहे
तेरे नाम की चादर लपेटे लपेटे
रात सारी बस कटती रहे

Ishtehaar si ho gayi he zindagi meri

poetry With Panna

निकल जाते है उन रास्तों पर

निकल जाते है उन रास्तों पर
जिनकी कोई मंजिल नहीं
अंधेरे होते है जिन राहों में
मगर कोई अंजुमन नहीं
होते है कांटे, कंकड़
फूलों का बागान नहीं
बस इक साथी की तलाश होती है
जो हमारी तरह इन राहों पे निकला हो

“गुमराह ” #2Liner-36

ღღ__ज़रा देखो तो निकल के “साहब”, अब तक वो आए क्यूँ नहीं;
.
कहीं ऐसा तो नहीं रस्तों नें, उन्हें गुमराह कर दिया !!……..‪#‎अक्स‬

This Silence

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