Poems

अपना बनाया क्यों

जब भूलना ही था तो अपना बनाया क्यों।
भटके को सही राह, तुमने दिखाया क्यों।

तन्हा हम कैसे भी हो, जी ही तो रहे थे,
उम्मीद का शम्मा जला, तुमने बुझाया क्यों।

भूलने की बात से, एक तूफान सा उठा है,
कश्ती को मझधार से, तुमने बचाया क्यों।

छोड़ दिया होता हमारे हाल पे उसी वक्त,
गमे-जुदाई दिल पर, तुमने लगाया क्यों।

आज हाल ये है, न ही जीते हैं, न मर सकते,
हाथ थाम कर मरने से, तुमने बचाया क्यों।

तुम्हें भूल पाना नामुमकिन सा लगता है,
इतना प्यार मुझ पर, तुमने लुटाया क्यों।

तेरे बगैर रह नहीं सकता, साथ न छोड़ना,
कुछ कर गुजरूं तो ना कहना, नहीं बताया क्यों।

देवेश साखरे ‘देव’

रिक्शावाला आई़ 0ए0एस0

शेषांश,,,,,,,,,

दो रुपये का ब्लेड भला दाढ़ी काटे फिर उग आये।
मुट्ठी एक चना से भूखा अपनी भूख मिटा पाए।।

लो मैडमजी आ गए हम महिला काॅलेज के द्वारे।
दस के बदले बीस रुपये देने लगी मैं उसको भाड़े।।

वह बोला मैडमजी मुझपे क्योंकर कर्ज चढ़ाती हो?
दस रुपये के कारण क्यों मेरा इमान हिलाती हो?

कर्ज नहीं है तेरे ऊपर मेहनत का इनाम है ये।
सदाचार की करे प्रशंसा पढ़े लिखे का काम है ये।।

देना चाह रही हो आप तो इतनी विनती करना।
सबके जीवन में खुशियाँ हो प्रभु से विनती करना।।

कल प्रातःकाल की बेला में सबको एक खुशी हो।
मेरे संग संग सबके मुख पर हर्षित मधुर हँसी हो।।

रविवासरीय अखवार देख चौंक गई मैं एकाएक।
वही बेनाम रिक्शावाला पन्ना पे बैठा आलेख।।

मेहनत आज रंग लाया रिक्शावाला आई़ ए़ एस़ था।
रोशन नाम किया अपना जग में नहीं वह बेबस था।।

विनयचंद नहीं रुप रंग ज्ञान बुद्धि व मेहनत हो।
कोयला हीं हीरा बनता है भूगर्भ में अवनत हो।।
पं़विनय शास्त्री

मुझमें गुम तुम

प्यार होता ही है गहराइयों में,
वरना गहरे पानी में कौन डूबकी लगाता है।
तेरी तीखी निगाहों का मिलना,
सर्द रातों में भी आतिश मुझे बनाता है।
याद नहीं रहता उस वक्त कुछ भी,
जब तेरा चेहरा सामने ठहर जाता है।
आंख भर देखना तेरा मुझको,
इस कायनात में सबसे सुंदर बनाता है।
जब जखीरा तेरी यादों का घेरता मुझको,
भरी महफिल में भी तन्हा मुझे कर जाता है।
रफ्ता रफ्ता हो गए मुझ में तुम गुम,
तुम हो या मैं समझ नहीं आता।
निमिषा सिंघल

मुझको जीने दो

जर्रा हूं मैं आकाश नहीं,
आकाश तले ही रहने दो।
पिंजर हूं कोई मोम नहीं,
पत्थर सा मुझे यूं रहने दो।
आतिश हूं मैं आफताब नहीं,
जलता बुझता सा रहने दो।
कब से जी भर कर रोया नहीं,
मुझे आंसू बनकर बहने दो।
बिन पंख परिंदे जैसा हूं,
मुझे अपने हाल पर रहने दो।
एक खलीश से मेरे सीने में,
उस खलिश मैं मुझको जीने दो।
बिन तेरे मैं एक जिस्म हूं बस,
मुझे रूह बिना ही रहने दो।

मुझको जीने दो

जरा हूं मैं आकाश नहीं,
आकाश तले ही रहने दो।
पिंजर हूं कोई मोम नहीं,
पत्थर सा मुझे यूं रहने दो।
आतिश हूं मैं आफताब नहीं,
जलता बुझता सा रहने दो।
कब से जी भर कर रोया नहीं,
मुझे आंसू बनकर बहने दो।
बिन पंख परिंदे जैसा हूं,
मुझे अपने हाल पर रहने दो।
एक खलीश से मेरे सीने में,
उस खलिश मैं मुझको जीने दो।
बिन तेरे मैं एक जिस्म हूं बस,
मुझे रूह बिना ही रहने दो।

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