कविताएँ हिन्दी

उम्र की पतंगें !

कविता   उम्र की पतंगें : अनुपम त्रिपाठी   वे, बच्चे ! बड़े उल्हास से चहकते—मचलते; पतंग उड़ाते …………. अचानक थम गए !!   उदास मन लिए लौट चले घर को ———— पतंग छूट जाने से ———— डोर टू…ट जाने से   क्या, वे जान सकेंगे ? कभी कि; ———— हम भी बिखेरा करते थे, मुसकानें यूं ही : चढ़ती उम्र के; बे—पनाह जोश में .   मग... »

बच्चे हम फूटपाथ के

बच्चे हम फूटपाथ के

बच्चे हम फूटपाथ के, दो रोटी के वास्ते, ईटे -पत्थर  तलाशते, तन उघरा मन  बिखरा है, बचपन  अपना   उजड़ा है, खेल-खिलौने हैं हमसे दूर, भोला-भाला  बचपन अपना, मेहनत-मजदूरी करने को है मजबूर मिठई, आईसक्रीम और गुबबारे, लगते बहुत लुभावने , पर बच्चे हम फूटपाथ के, ये चीजें नहीं हमारे  वास्ते, मन हमारा मानव का है, पर पशुओं सा हम उसे पालते, कूड़ा-करकट के बीच, कोई मीठी गोली तलाशते, सर्दी-गर्मी और बरसात, करते हम पर... »

बचपन गरीब

यूँ तो हर रोज गुजर जाते हैं कितने ही लोग करीब से, पर नज़र ही नहीँ मिलाते कोई इस बचपन गरीब से, रखते हैं ढककर वो जो पुतले भी अपनी दुकानों में, वो देखकर भी नहीं उढ़ाते एक कतरन भी किसी गरीब पे, बचाते तो अक्सर दिख जाते हैं दो पैसे फकीर से, पर लगाते नहीं मुँह को दो रोटी भी किसी बच्चे गरीब के॥ राही (अंजाना) »

भूखे थे बच्चे दो दिनों से नींद कैसे आती।

भूखे थे बच्चे दो दिनों से नींद कैसे आती। माँ के पास कहानियों के सिवा कुछ न था। @@@@RK@@@@ »

बाल श्रमिक

मंदिर में पानी भरती वह बच्ची चूल्हे चौके में छुकती छुटकी भट्टी में रोटी सा तपता रामू ढावे पर चाय-चाय की आवाज लगाता गुमशुदा श्यामू रिक्से पर बेबसी का बोझ ढोता चवन्नी फैक्ट्रीयों की खड़खड़ में पिसता अठन्नी सड़कों,स्टेशनों,बसस्टॉपों पर भीख माँगते बच्चे भूखे अधनंगे कचरे में धूँढते नन्हे हाथ किस्मत के टुकड़े खो गया कमाई में पत्थर घिसने वाला छोटे किसी तिराहे चौराहे पर बनाता सिलता सबके टूटे चप्पल जूते। दीवार... »

माँ

अहसास प्यार का माँ के, माँ की यादें, माँ का साथ। गज़ब सुकूँ मिलता है, जब माँ सर पर फेरे हाथ॥ माँ के हाँथ की थपकी, माँ का प्यार, वो माँ की ममता। बच्चे को भोजन देकर भूखे सोने की क्षमता॥ माँ ही सृष्टि रचयिता, शिशु की माँ ही रचनाकार है। प्रेम, भक्ति और ज्ञान सभी से बढ़कर माँ का प्यार है॥ बिन माँ सृष्टि अकल्पित नामुमकिन इसका चल पाना है। शब्दों में नामुमकिन माँ को अभिव्यक्ति दे पाना है। ________________ श... »

किताब ज़ार ज़ार रोई

किताबे भी दर्द मे रोती हैं सिसकती हैं ,लहू लहान तेरे दर्द में होती हैं ************ वो चंद घंटे पहले शहर में उतरा ,शहर की कुछ गलियो मे घूमा सड़को को देखा ,जन्नत घूमा,रंग बिरंगे फूल खुशियाँ ही खुशियाँ अचानक मोड़ पर मुड़ते ही टूटे सपनो की बस्ती, पेट की आग रोटी का तमाशा सकंरी गलियाँ, धूप की आग में लिपटा मन,टिन टपड़ की छत और छत के अन्दर बिखरे वजूद,कच्चा फर्श कॉच की बोतल,रेंगता दिल,दो बटन के बीच से झाक... »

मैं बच्चा बन जाता हूँ

मैं बच्चा बन जाता हूँ

कविता … “मैं बच्चा बन जाता हूँ” न बली किसी की चढ़ाता हूँ। न कुर्बानी से हाथ रंगाता हूँ।  रोने की जब दौड़ लगती है, मैं गिद्धों पर आंसू बहाता हूँ। न मैं मंदिर में जाता हूँ। न मस्जिद से टकराता हूँ।  ईश्वर मिलने की चाहत में,  मैं विद्यालय पहुँच जाता हूँ। छोटे-छोटे कृष्ण, सुदामा, पैगम्बर, बुद्ध मिल जाते हैं। हमसे तो बच्चे ही अच्छे, जो एक ही थाली में खाते हैं। जाति, धर्म का ज्ञान नहीं बच्चे मन के सच... »

जब हम बच्चे थे

जब हम बच्चे थे

जब हम बच्चे थे , चाहत थी की बड़े हो जायें | अब लगता है , कि बच्चे ही अच्छे थे || अब न तो हममें कोई सच्चाई है , न ही सराफ़त , पर बचपन मे हम कितने सच्चे थे | जब हम बच्चे थे || अब न तो गर्मी कि छुट्टी है , न ही मामा के घर जाना , माँ का आँचल भी छूट चुका है , पापा से नाता टूट चुका है , पहले सारे रिस्ते कितने सच्चे थे | जब हम बच्चे थे|| न तो कोई चिंता थी , बीबी बच्चे और पेट की, न ही कोई कर्ज़, बैंक ,एलआईसी... »

दरके आइनों को

दरके आइनों को नाज़ुकी की जरूरत है गर आ जाएँ इल्ज़ाम यही तो उल्फत है फासले वस्ल के यू सायें से बढ़े जाते है ये कोई मिलना या तुम्हारी रुखसत है हरसूँ बिखर गए तेरे पन्नें नसीब के अब तो खाली जिल्द की हसरत है वक़्त रूठा किसी बच्चे की माफिक जिसकी जिद है या कोई शरारत है अब किस और जहान जाएँ’अरमान’ जिस तरफ देखिये बस नफरत है दरके आइनों को नाज़ुकी की जरूरत है गर आ जाएँ इल्ज़ाम यही तो उल्फत है राजेश̵... »

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