बच्चों के लिए हिन्दी कविता

मजबूर बच्चे

कितने मजबूर होकर यूँ हाथ फैलाते होंगे, भला किस तरह ये बच्चे सर झुकाते होंगे, उम्मीदों के जुगनू ही बस मंडराते होंगे, बड़ी मशक्कत से कहीं ये पेट भर पाते होंगे, तन पर चन्द कपड़े ही बस उतराते होंगे, शायद सोंच समझ कर ही ये मुस्काते होंगे, बहुत संग दिल होकर ही वो इतराते होंगे, हालत देख कर भी जो न प्रेम भाव दिखलाते होंगे।। राही (अंजाना) »

खिलौने वाला

हाथ में लेकर सीटी आता साइकिल पर होकर सवार एक डंडे पर ढेर से खिलौने जिसमे रहते उसके पास गली गली और सड़क सड़क बच्चों की खुशियाँ लाता है देख के बच्चे शोर मचाते खिलौने वाला आया है देख कर चिंटू मिंटू से कहता धनुष बाण तो अब मैं लूँगा तब मिंटू चिंटू से कहता हनुमन गदा को मै ही लूँगा इतने में आती है भोली देख के बर्तन करती ठिठोली कहती बर्तन मैं भी लूंगी लूँगी साथ में गुड़िया चूड़ी सोहन मोहन दौड़े आते कहते हम भी ... »

खिलौने वाला

हाथ में लेकर सीटी आता साइकिल पर होकर सवार एक डंडे पर ढेर से खिलौने जिसमे रहते उसके पास गली- गली और सड़क- सड़क बच्चों की खुशियाँ लाता है देख के बच्चे खुश शोर मचाते खिलौने वाला आया है। देख कर चिंटू ,मिंटू से कहता धनुष बाण तो अब मैं लूँगा तब मिंटू ,चिंटू से कहता हनुमन गदा को मै ही लूँगा। इतने में आती है भोली देख के बर्तन करती ठिठोली कहती बर्तन मैं भी लूंगी लूँगी साथ में गुड़िया चूड़ी। सोहन – मोहन द... »

गुब्बारे

देख गुब्बारे वाले को जब बच्चे ने आवाज़ लगाई दिला दो एक गुब्बारा मुझको माँ से अपनी इच्छा जताई। देखो न माँ कितने प्यारे धूप में लगते चमकते सितारे लाल, गुलाबी, नीले ,पीले मन को मेरे भाते गुब्बारे। देख उत्सुक्ता माँ तब बोली बच्चे माँ मन रखने को भैया दे दो इसको गुब्बारा पैसे ले लो मुझसे तुम। »

ममता

एक युवती जब माँ बनती है, ममता के धागों से बच्चे का भविष्य बुनती है, ज़ज्बात रंग -बिरंगे उसके, बच्चे के रंग में ढलते हैं, दिल के तारों से हो झंकृत, लोरी की हीं गूंज निकलती, माँ अल्फाज़ में जैसे हो, दुनियां उसकी सिमटती चलती , फिर क्या, नयनों में झिलमील सपने, आँचल में अमृत ले चलती , पग -पग कांटे चुनती रहती, राहों की सारी बाधाएं, दुआओं से हरती चलती, हो ममता के वशीभूत बहुत, वो जननी बन जीवन जनती है, एक यु... »

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ पानी में बहाते नज़र आते थे, एक रोज़ मिले थे वो बच्चे जो अपने सपने बड़े बताते थे, बन्द चार दीवारों से निकलकर खुले आसमान की ठण्डी छावँ में, इतने सरल सजग जो अक्सर खुली किताब से पढ़े जाते थे।। राही (अंजाना) »

सवाल पूछा

संस्कार में दबे बच्चे से घूरते हुए अध्यापक ने सवाल पूछा, बेटा ये बताओ हम कौन? बच्चा मुस्कुराते बोला, अध्यापक जी आप गुरु हम शिष्य यानी गुरु धाम में हम पढ़ रहे आप पढ़ा रहे ‘हम कौन? हम कौन?’ अशोक बाबू माहौर »

तब आना तुम

तब आना तुम, जब हिना का रंग कई दफा चढ कर उतर जाए। जब अपने बच्चे की खातिर अबला वात्सल्य प्रेम में बिखर जाए तब आना तुम, जब मेरे जुनून जर्जर हो जाए और मेरे पास बहुत कुछ हो, दिखलाने को, बतलाने को, समझाने को, तब आना तुम जब हमारे बीच की खामोशी को इक उम्र हो जाए, और ये सफेद इश्क़ भी अपने इम्तिहान से शर्मसार हो जाए। तब आना तुम। जब आना तुम, आकर लिपट जाना जैसे चंद लम्हे पहले ही मिले हो। हवा के रूख की परवाह क... »

जंगे आज़ादी (आजादी की ७०वी वर्षगाँठ के शुभ अवसर पर राष्ट्र को समर्पित)

वर्ष सैकड़ों बीत गये, आज़ादी हमको मिली नहीं लाखों शहीद कुर्बान हुए, आज़ादी हमको मिली नहीं भारत जननी स्वर्ण भूमि पर, बर्बर अत्याचार हुये माता बहन बेटियों के, इज्ज़त धन सम्मान लुटे बिक गये धरम लुट गये करम, सब ओर गुलामी बू छायी प्राचीन सभ्यता संस्कृति गौरव, भूल गये हम सच्चाई ब्राह्मण कहता हम सर्वशेष्ट, छत्रिय कहता हम शासक है बनिया कहता हम धन कुबेर, हरिजन अछूत बस सेवक है मंदिर मस्जिद स्कूल सभी, जाना हरिजन... »

हैरानी सारी हमें ही होनी थी – बृजमोहन स्वामी की घातक कविता।

हैरानी कुछ यूँ हुई कि उन्होंने हमें सर खुजाने का वक़्त भी नही दिया, जबकि वक़्त उनकी मुट्ठियों में भी नही देखा गया, लब पर जलती हुई सारी बात हमने फूँक दी सिवाय इस सिद्धांत के कि हमने सपनों की तरह आदमी देखे, जबकि ‘सपने’ किसी गर्भाशय में पल रहे होते तो सारे अल्ट्रासाउंड घड़ियों की तरह बिकते और हम वक़्त देखने के लिए सर फोड़ते, मेहँदी की तरह लांछन लगाते, सिगरेटों की तरह घर फूंकते, कुत्तों की तरह ... »

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