बेटी पर मार्मिक कविता

मृत्योपरांत स्मरण

शीर्षक – मृत्योपरांत स्मरण (एक बेटी के भाव अपने पिता की मृत्यु पर ) जिसने हाथ पकड़कर चलना सिखाया आज साथ छोड़ कर जा रहा है वो… गिरकर सम्भलना सिखाया जिसने आज फिर उठने से कतरा रहा है वो जिसने हर एक को बनाया आज टूटे जा रहा है वो ठहरना सिखाया जिसने आज चले जा रहा है वो पढ़ लेता हैं जो मन की बात को आज ज़ुबा से लफ्ज़ बयां ना कर पा रहा हैं वो जिसने चेहरे से ना झलकने दिया गम कभी आज आँसुओ की बारिश में... »

केवल बेटी ही नही, वेटे भी घर छोड़ जाते।

केवल बेटी ही नही, बेटे भी घर जाते। दो जुम के रोटी के लिए अपना घर– परिवार छोड़ जाते। जो आज तक पला बाप के हाथ के छाये मे, आज वो दुसरे शहर मे भुखे पेट सो जाते, जब पत्नी पुछती कब आओगे लौटकर अपने शहर मे, तो कुछ बहाना बनाकर उसे समझा देते। केवल बेटी ही नही बेटे भी घर छोड़ जाते। जो दिन रात करते थे ,मनमानी आज वो आँसु पी कर सो जाते । दो जुम की रोटी के लिए अपनो का साथ छोड़ जाते, केवल बेटी ही नही बेटे भ... »

बेटी

आँखों ही आँखों में जाने कब बड़ी हो जाती है बिन कुछ कहे सब कुछ समझ जाती है जो करती थी कल तक चीज़ों के लिए ज़िद आज वो अपनी इच्छाओं को दबा जाती है अब कुछ भी न कहना पड़ता है उससे सब कुछ वो झट से कर जाती है एक गिलास पानी का भी न उठाने वाली आज पूरे घर को भोजन पकाती है कभी भी कहीं भी बैग उठा कर चल देने वाली आज वो अपना हर कदम सोंच समझ कर बाहर निकालती है।। »

ताल्लुक संस्कृति से अपना वो खुल के दिखाती है,

ताल्लुक संस्कृति से अपना वो खुल के दिखाती है,

ताल्लुक संस्कृति से अपना वो खुल के दिखाती है, बेटी इस घर की जब गुड़िया को भी दुप्पट्टा उढ़ाती है।। राही (अंजाना) »

जवाब…

जवाब… बस देती ही रही हूं जवाब… घर जाने से लेकर घर आने का जवाब… खाने से लेकर खाना बनाने का जवाब… बस देती ही रही हूं जवाब… चित्र से लेकर चरित्र का जवाब… सीता से लेकर द्रौपदी तक बस देती ही रही हूं जवाब… समर्पण में दर्पण देखने का समय ना मिला मुझे मगर देती रही मैं सबको जवाब… कभी उद्दंड कभी स्वार्थी कभी चरित्र हीन बताया… थोड़ा अपने लिये जी क्या लिया अ... »

भारत के रक्षक

इतिहास है आज भी जिस पर मौन, वह है आखिर कौन, वह है आखिर कौन? जो लड़ता रहा हर समय किसी के लिए, और मरता रहा किसी के लिए| रहता है वो सबसे दूर, देश के प्यार में है वो मजबूर| दो देशों की ‘नेतागिरी’, जिसमे है अब सेना ‘गिरी’| जिसकी माँ करती उसके लिए हमेशा इंतज़ार| बेटी कहती है बार बार,लगता है हो गये साल हज़ार आपका करे दीदार| न जाने क्यों बटा है ये जहां, जिसमे ली है लोगों ने पनाह| हर द... »

भारत के रक्षक

इतिहास है आज भी जिस पर मौन, वह है आखिर कौन, वह है आखिर कौन? जो लड़ता रहा हर समय किसी के लिए, और मरता रहा किसी के लिए| रहता है वो सबसे दूर, देश के प्यार में है वो मजबूर| दो देशों की ‘नेतागिरी’, जिसमे है अब सेना ‘गिरी’| जिसकी माँ करती उसके लिए हमेशा इंतज़ार| बेटी कहती है बार बार,लगता है हो गये साल हज़ार आपका करे दीदार| न जाने क्यों बटा है ये जहां, जिसमे ली है लोगों ने पनाह| हर द... »

जब मैं तुम्हे लिखने चली

जमाने में रहे पर जमाने को खबर न थी ढिंढोरे की तुम्हारी आदत न थी अच्छे कामों का लेखा तुम्हारा व्यर्थ ही रह गया हमसे साथ तुम्हारा अनकहा सा कह गया जीतना ही सिखाया हारने की मन में न लाने दी तो क्यों एक पल भी जीने की मन में न आने दी हिम्मत बांधी सबको और खुद ही खो दी दूर कर ली खुदा ने हमसे माँ कि गोदी दिल था तुम्हारा या फूलों का गहना अब जुदाई को तुमसे सदा ही सहना रोता रहा दिल आँखों ने साथ न दिया फैसले क... »

Ghazal

मुहँ लटकाए आख़िर तू क्यो बैठा है इस दुनिया में जो कुछ भी है पैसा है दुख देता है घर में बेटी का होना चोर -उचक्का हो लड़का पर अच्छा है कुछ भी हो औरत की दुश्मन है औरत सच तो सच है बेशक थोड़ा कड़वा है सबकी हसरत अच्छे घर जाए बेटी लड़का कितना महगां हो पर चलता है शादी क्या है सौदा है जी चीज़ो का खर्च करेगा ज्यादा वो ही बिकता है लुटने वालो को लूटे तो क्या शिकवा आज लकी मै भी लूटूँ तो कैसा है »

Ghazal

मुहँ लटकाए आख़िर तू क्यो बैठा है इस दुनिया में जो कुछ भी है पैसा है दुख देता है घर में बेटी का होना चोर -उचक्का हो लड़का पर अच्छा है कुछ भी हो औरत की दुश्मन है औरत सच तो सच है बेशक थोड़ा कड़वा है सबकी हसरत अच्छे घर जाए बेटी लड़का कितना महगां हो पर चलता है शादी क्या है सौदा है जी चीज़ो का खर्च करेगा ज्यादा वो ही बिकता है लुटने वालो को लूटे तो क्या शिकवा आज लकी मै भी लूटूँ तो कैसा है »

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