बेटी पर मार्मिक कविता

|| दहेजी दानव ||

बेटा अपना अफसर है.. दफ्तर में बैठा करता है.. जी बंगला गाड़ी सबकुछ है.. पैसे भी ऐठा करता है.. पर क्या है दरअसल ऐसा है.. पैसे भी खूब लगाए हैं.. हाँ जी.. अच्छा कॉलेज सहित.. कोचिंग भी खूब कराए हैं.. प्लस थोड़ा एक्स्ट्रा खर्चा है.. हम पूरा बिल ले आए हैं.. टोटल करना तो भाग्यवान.. देखो तो कितना बनता है.. जी लगभग पच्चीस होता है.. बाकी तो माँ की ममता है.. जी एक अकेला लड़का है.. उसका कुछ एक्स्ट्रा जोड़ूँ क्या..... »

मुक्तक-मनहरण घनाक्षरी

मुक्तक छंद – वार्णिक (मनहरण घनाक्षरी) सामांत-आई पदांत- है ८८८७-१६-१५ पहले जो पढने में गदहे कहलाते थे उनकी भी दिखती आज नही परछाई है ! नवयुग के बच्चे देते एक भी जवाब नही पता नही चलता कैसी करते पढाई है !! लाज और लिहाज सब दूर हो गये सभी बाप के ही सामने में करते ढीठाई है ! कहत मतिहीन कवि डांट जो पिलाई तो बेटी ने भाग घर से नाक कटवाई है || पढते भी कैसे जब शासन प्रशासन ने बिना पढै पास करै बीणा उठाई ... »

परी

मिट्टी से गढ़ी है,  नन्ही सी परी है,  ना माँ की दुलारी, ना बाबा की प्यारी, ये सङकें ही घर है इसका , यहीं सारा जग है जिसका । ना गुङिया,मोटर गाङी,  ना बर्तन,कप-प्लेट,ना रेलगाङी,   कोई खिलौना नही खेलने को, नही कोई झूला झूलने को, बस है भूख और गरीबी, कोई और नही,बस यही दोनों इसके करीबी। ऊपर खुला आसमान,  नीचे गर्मी और थकान,  कभी सर्दी की रातों की ठिठुरन, कभी बरसात में बचता,बचाता भीगता बदन, सूरज,चंदा इसके... »

बेटी की अभिलाषा

आज भी मै बेटी हूँ तुम्हारी, बन पाई पर ना तुम्हारी दुलारी, हरदम तुम लोगों ने जाना पराई, कर दी जल्दी मेरी विदाई। जैसे थी तुम सब पर बोझ, मुझे भेजने का इंतज़ार था रोज़, मुझे नही था जाना और कहीं, रहना था तुम्हारे ही साथ यहीं। पर मेरी किसी ने एक ना मानी, कर ली तुम सबने अपनी मनमानी, भेज दिया मुझे देस पराया, क्या सच में तुमने ही था मुझको जाया? जा पहुँची मैं अनजाने घर, लेकर एक छुपा हुआ डर, कौन मुझे अपनायेग... »

पराई

हाँ हूँ मै पराई   लो कह दिया मैंने   खुद को ही पराई….       सबने जी दुखाया,   कहके मुझे पराया,   बाबा की बेटी बन,   बनके भाई की बहन,   निभाए मन से सारे बंधन,   फिर भी मुट्ठी भर अन्न   पीछे फेंक माँ के आँगन,   चुकाने पड़े  सारे क़र्ज़,   निभाए सारे जितने थे फ़र्ज़,   कर दी मेरी विदाई,   कह कह कर मुझे पराई……       आई पिया के देस,   बदला ठौर, बदला भेस,   तन मन सब वारा,   अपनाये नए  संस्क... »

खाकी – खद्दर पहने हुये , इंसान बिकने लगे

खाकी – खद्दर पहने हुये , इंसान बिकने लगे कोडियों में यहाँ लोगो के,ईमान बिकने लगे ।। कही मुर्दे तो,कही आज शमशान बिकने लगे, चदरों पे खुदा,पत्थरो में भगवान बिकने लगे ।। सब की सब इन सियासी लोगो की चाले है, कहीं पे हिन्दू तो ,कही मुस्लमान बिकने लगे ।। चिमनियों का धुँआ,अब आवाज लगाता नहीं, घर से मुफलिस के , अब सामान बिकने लगे ।। तितलियाँ सर पटक रोने लगी,उजड़े चमन पे कागजी फूलो के लिए , गुलदान बिकने ... »

आँगन में जो फुदक रही थी

आँगन में जो फुदक रही थी एक छोटी सी चिड़िया! दौड़ी उसे पकड़ने उसके पीछे छोटी बिटिया!! बोली मैंने आज पढ़ा है तू है दुर्लभ प्राणी! तुझे संजोना है हम सब को देकर दाना पानी !! गौरैया ने तनिक ठहर धीरे से पंख हिलाये भाव करुण से उस पक्षी की आँखो में आ छाये! बोली बिटिया तू तो जाने क्या तेरा दायित्व लेकिन तू ये समझ तेरा भी ख़तरे में अस्तित्व! कैसे तुमसे कहूँ तुझे है इतना नहीं पता मेरा संकट अगर प्रदूषण तेरा त... »

माँ मेरी

तुम्हारे हाथ का हर एक छाला, चुभा जाता है इस दिल में एक भाला, हर एक रेखा जो तुम्हारी पेशानी पर है, एक दास्तां बयां कर जाती किसी परेशानी की है, बता जाती है वो दर्द को,जो सहे तुमने, हमें लाने इस हसीन जहां में अपने। उंगलियाँ पकङ चलना सिखाया, मामा,दादा,बोल बोल देखो खूब बुलवाया, खाना खाना, नाचना गाना सब सीखे तुमसे, तंग किया,फिरकी की मानिंद घुमाया,फिर भी ना खीजीं हमसे, हर रोज़ नयी तैयारी थी, हम ही तो तुम... »

न्याय बीमार पड़ी है, कानून की आँख में पानी है

न्याय बीमार पड़ी है, कानून की आँख में पानी है

अत्याचार दिन ब दिन बढ़ रहे हैं भारत की बेटी पर। रो-रो कर चढ़ रही बिचारी एक-एक करके वेदी पर ।। भिलाई से लेकर दिल्ली तक प्रतिदिन नई कहानी है। किसने पाप किया है ये, किसकी ये मनमानी है।। गली-गली, बस्ती-बस्ती में निर्भया बलिदानी है। न्याय बीमार पड़ी है अब, कानून की आँख में पानी है।। स्कुल-कालेज, आफिस, घर,  सभी जगह पर खतरा है। मानवता तो अब मर रही है सड़को पर सन्नाटा पसरा है।। कभी-कभी मर्दाना पुलिस औरतों... »

desh

ब्रह्मा-ऋषि-मुनि-चरक का तो ये देश हो सकता नहीं ,, क्यूँ बताते हो डॉक्टर पेट में बेटी है बेटा  नहीं ..!! »

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