माँ पर मार्मिक कविता

माँ मेरी

संघर्षों में जीवन की तू परिभाषा कहलाती है, रंग बिरंगी तितली सी तू इधर उधर मंडराती है, खुद को पल- पल उलझा कर तू हर मुश्किल सुलझाती है, खुली हवा में खोल के बाहें तू मन ही मन मुस्काती है, आँखे बड़ी दिखाकर तू जब खुद बच्ची बन जाती है, मेरे ख़्वाबों को वहम नहीं तू लक्ष्य सही दिखलाती है।। जो भी मिले किरदार निभा कर दृष्टि में सबकी आती है, बस एक माँ ही है जो हर दिल की पूरी दुनियाँ कहलाती है।। राही (अंजाना) »

ममता

एक युवती जब माँ बनती है, ममता के धागों से बच्चे का भविष्य बुनती है, ज़ज्बात रंग -बिरंगे उसके, बच्चे के रंग में ढलते हैं, दिल के तारों से हो झंकृत, लोरी की हीं गूंज निकलती, माँ अल्फाज़ में जैसे हो, दुनियां उसकी सिमटती चलती , फिर क्या, नयनों में झिलमील सपने, आँचल में अमृत ले चलती , पग -पग कांटे चुनती रहती, राहों की सारी बाधाएं, दुआओं से हरती चलती, हो ममता के वशीभूत बहुत, वो जननी बन जीवन जनती है, एक यु... »

एक माँ ही तो है

एक माँ ही तो है जिसने मुझसे और मैंने उससे बिना एक दूजे को देखे बेपनाह प्रेम और साथ निभाया है। एक माँ ही तो है जिसने मेरे बिना कुछ बोले मेरी हर एक बात को समझ अपनाया है। एक माँ ही तो है जिसने हर पल मुझे सबकी बुरी नज़रों से तिलक लगाकर बचाया है। एक माँ ही तो है जिसने मुझे तपती धूप में भी भोजन बनाकर मेरा पेट भरवाया है। एक माँ ही तो है जिसने हर पल, हर क्षण मेरा साथ बिना किसी स्वार्थ निभाया है। एक माँ ही ... »

लाख अपने गिर्द हिफाजत की लकीरें खीचूँ

लाख अपने गिर्द हिफाजत की लकीरें खीचूँ, एक भी उन में नहीं “माँ ” तेरी दुआओं जैसी, लाख अपने को छिपाऊँ कितने ही पर्दों में, एक भी उन में नहीं “माँ” तेरे आँचल जैसा, लाख महगे बिस्तर पर सो जाऊँ मैं, एक भी नहीं “माँ” उनमें तेरी गोद जैसा, लाख देख लूँ आइनों में अक्स अपना, एक आइना भी नहीं “माँ” तेरी आँखों जैसा, लाख सर झुका लूँ उस मौला/भगवान के दर पर, एक दरबार ... »

कितनी दफ़ा उँगलियाँ अपनी जला दी तूने

कितनी दफ़ा उँगलियाँ अपनी जला दी तूने… ‘माँ’ मेरे लिए चंद, रोटियाँ फुलाने में ! कितनी दफ़ा रातें गवां दी, “माँ” तूने मुझे सुलाने में, कितनी दफ़ा आँचल भिगा दिया, “माँ” तूने मुझे चुपाने में, कितनी दफ़ा छुपा लिया, “माँ” बुरी नज़र से तूने मुझे बचाने में, कितनी दफ़ा बचा लिया, “माँ” गलत राह तूने मुझे जाने में, कितनी दफ़ा लुटा दिया खुद को, “... »

मां

खामोशी को समेटकर कुछ अल्फाजो का पिटारा लाया हूं, उस ख़ुदा से भी बढ़कर है वो जिसके बारे में आपको कुछ बताने आया हूं। उसकी हिदायतों से मैने जिंदगी के हर रंग में रंगना सीखा है, उसका आशीर्वाद पाकर हर चुनौती से लड़ना सीखा है। हमारी छोटी सी चोट को देखकर ही बड़ी आसानी से रो देती है, शायद इसलिए हर इंसान के लिए उसकी मां भगवान से भी बढ़कर होती है। वो मुझे जानती थी भी नहीं थी जब नौ महीने उसने मुझे अपनी कोख मे... »

तुम कब आओगी

शाम हो गई तुम्हे खोजते माँ तुम कब आओगी जब आओगी घर तुम खाना तब ही तो मुझे खिलाओगी, रात भर न सो पाई करती रही तुम्हारा इंतजार सुबह होते ही बैठ द्वार निगाहें ढूंढ रही तुम्हे लगातार, पापा बोले बेटा आजा अब माँ न वापिस आएगी अब कभी भी वह तुम्हे खाना नहीं खिलाएगी, रूठ गई हम सब से मम्मी ऐसी क्या गलती थी हमारी छोड़ गई हम सबको मम्मी ऐसी क्या खता थी हमारी, ढूंढ रही हर पल निगाहे न जाने कब मिल जाओगी इक आस लिए दि... »

जब मैं तुम्हे लिखने चली

जमाने में रहे पर जमाने को खबर न थी ढिंढोरे की तुम्हारी आदत न थी अच्छे कामों का लेखा तुम्हारा व्यर्थ ही रह गया हमसे साथ तुम्हारा अनकहा सा कह गया जीतना ही सिखाया हारने की मन में न लाने दी तो क्यों एक पल भी जीने की मन में न आने दी हिम्मत बांधी सबको और खुद ही खो दी दूर कर ली खुदा ने हमसे माँ कि गोदी दिल था तुम्हारा या फूलों का गहना अब जुदाई को तुमसे सदा ही सहना रोता रहा दिल आँखों ने साथ न दिया फैसले क... »

इतने हैं तेरे रूप के मैं सबको गिना नहीं पाउँगा,

इतने हैं तेरे रूप के मैं सबको गिना नहीं पाउँगा, खोल कर रख दी पल्लू की हर एक गाँठ तुमने, मैं तुम्हारे प्रेम का किस्सा सबको सुना नहीं पाउँगा, डर कर छिप जाता था अक्सर तेरे पीछे,, आज इस भीड़ में भी मैं तुझको भुला नहीं पाउँगा।। राही (अंजाना) »

जो ऊँगली पकड़ चलाती है

जो ऊँगली पकड़ चलाती है, जो हर दम प्यार लुटाती है, जो हमको सुलाने की खातिर, खुद भूखी ही सो जाती है, खेल खिलौने कपड़े लत्ते जो हमको दिलवाती है, खुद एक ही साड़ी में जो सारा जीवन जीती जाती है, अपने सपनों को तज कर जो हमको सपने दिखलाती है, कोई और नहीं कोई और नहीं वो बस एक माँ कहलाती है॥ राही (अंजाना) »

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