life

जिसको जरूरत होती है….

जिसको जरूरत होती है वही साथ चलता है बिन जरूरत वाला तो बस तनक़ीद करने को ही मिलता है।   अपना मतलब न सोचे दूसरे की मदद करते वक़्त आज़ इस दुनियाँ में ऐसा इंसान कम मिलता है।   जो दूर से दिखाती हैं निगाहें पास जाकर छानने पर वही मंजर हर बार कब मिलता है।   बड़ी–बड़ी नावें पैदा करती है दरिया में बहुत भारी हलकम लेकिन अगर डूब जाएँ वें कभी तो उनका नामो–निशान कहां मिलता है।   खुद–ब–खुद पा... »

खुद को खोने के डर में

खुद को खोने के डर में

भीड़ भरी इस तन्हाई में जीना एक अलग नज़रिए के साथ कितना जरुरी बन गया दिन–ब–दिन बदलता यहां हर मुकाम मुझे ये जाहिर कर गया।   शोर भरे सन्नाटे में कैसे मैं ढ़ल गाया ये तो बस मैं ही जानता हूँ लेकिन खुद को खोने के डर में इस भीड़ भरी तन्हाई में जब से मैं खुद से मिल गया तब से मैं खुद को बड़ा खुशनसीब मानता हूँ।                                                          –   कुमार बन्टी   »

खुली किताब नहीं

खुली किताब नहीं

एक ही झटके में सबकुछ समझ जाओ तुम मेरा जीवन ऐसी कोई खुली किताब नहीं राह हासिल करने को गंदी नाली को स्वीकारले ऐसा ये कोई बेवकूफ आब नहीं।                                                                        -कुमार बन्टी »

अकेले होने का मतलब

अकेले होने का मतलब हर बार बस उदास होना ही  नहीं होता हो सकता था  मैं  भी  बरबाद पास अगर मैं  खुद के न होता।   किसीकी कोई चोट ऐसी भी होती है जिसका एक निशाँ ही कईं चोटो से कम नहीं होता।   कुछ गम सीख देने वाले भी होते हैं सिर्फ रूलाने खातिर ही हर गम नहीं होता।   गम किसीके जाने का कईं बार इतना गहरा होता है कि वो आँसुओं के ख़त्म होने पर भी कम नहीं होता।   लेकिन जिसने परम–प्रकाश पा लिया हो उसके लिए... »

कुछ पल

कुछ पल

कुछ पल बन जाते हैं सब कुछ।   कुछ पल कह देते हैं खुद ही कुछ।   कुछ पल छोड़ते नहीं संग में कुछ।   कुछ पल जिनका मिलता नहीं किसीकी को भी कोई भी हल।   कुछ पल यूँ ही जाते हैं ढ़ल।   कुछ पल टिकते नहीं कुछ भी पल।   कुछ पल रहते वहीं सदा आज़ और कल।   कुछ पल खो जाते हैं कहीं हो जाते हैं गुम बनकर सबसे हसीं पल।   कुछ पल रूलाते हैं बहुत जब याद आ जाएँ किसी पल।   कुछ पल देते हैं सकून अगर मिल जाएँ कुछ ही पल।   कुछ ... »

इनके बिना जीवन एक नाम ही है मात्र

इनके बिना जीवन एक नाम ही है मात्र

माघ की इस सार्दी में जब ये हवा चली जो खिलती धूप की गर्माहट में लग रही है भली।   जरा–से बादल हल्की–सी हवा कभी गरम कभी नरम।   सूरज बादलों की खिड़की से है झांक रहा कभी–कभी सर्दी से मैं भी हूँ कांप रहा लेकिन फिर आते ही धूप की चमक मौसम दिखा रहा है अपनी दमक।   पेड़ झूम रहे हैं इस हवा में ले रहे हैं एक दवा वें उस सन्नाटे भरी सुनसानपन की (सुनसानपन से बचने की) जो थी भरी उनमें कईं दिनों की... »

माटी मेरी पूछ रही  है मुझसे

माटी मेरी पूछ रही  है मुझसे दो घूँट पानी कब मिलेगा? बहाने मत बना दम निकला जा रहा है जल्दी बता पानी कब मिलेगा कैसे मैं अंकुरित कर दूं अन्न के दानो को कैसे मैं विश्वास कर लूँ कि पानी कल मिलेगा   वैसे  लगता तो नहीं कि अबकी बार मेरी माटी को जल मिलेगा लेकिन मैं भरोसा दिला रहा हूँ माटी को कि पानी जल्द ही मिलेगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि इस माटी की प्यास बुझाकर ही इस आस्मां को सकून का कोई पल मिलेगा       ... »

इतना वक़्त ही कहाँ

इतना वक़्त ही कहाँ मिलता है खाली मुझे कि मैं कभी किसीसे नाराज़ हो जाऊँ।   अभी अपने ही कल खातिर उलझा हूँ इतना कैसे मैं किसीका साथ आज़ हो जाऊँ।   सोचता हूँ कि चलते वक़्त के साथ अपने ख्यालो की लाज़ हो जाऊँ।   औरों का तो मुमकिन हो या न हो चलो अपने ही सिर का कभी ताज़ हो जाऊँ।   कईं बार ये भी सोचता हूँ कि छोड़ खुदको यूँ सरेआम करना अपने ही दिल में खुद का हर राज़ हो जाऊँ।     फिर ये भी सोचता हूँ कि जरूरतमंदो की ... »

अधूरापन ये मेरा

अधूरापन ये मेरा क्या पता मेरे भीतर कोई आग जला दे और फिर कभी मेरे भीतर कोई  कामयाब सूरज़ उगा दे।                                       –कुमार बन्टी   »

पत्थर भी बन जाए पारस

 किसी बस या फिर रेलगाड़ी का अकेला सफ़र और किसी ऊँची पहाड़ी का चुपचाप स्वर मेरी जगी हुई रातों का मज़ेदार भंवर और अभावों की जिंदगी में मेरा मददगार सब्र कहतें हैं मुझसे सब मिलकर कि तू खुद में जा बखूबी सँवर सुनता भी हूँ इन सबकी और इन्हीं के दौरान करता हूँ कोशिश भी कईं बार खुद को कहता हूँ खुद भी कि सँवार के खुद को तू बन जा ऐसे हुनर वाला कोई मानस कि पत्थर भी तेरे करीब आने से बन जाए पारस।                 ... »

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