poetry

सुखद है मित्रों का संसार

सुखद है मित्रों का संसार , बरसता निशदिन प्यार अपार। नहीं भौतिक है, है अध्यात्म , मित्र की महिमा अपरंपार । – जानकी प्रसाद विवश »

प्यारे मित्रो

प्यारे मित्रो….. नाचो -गाओ मन, नव-गीत गुनगुनाना , नये वर्ष खुशी खुशी ,सबके मन बहलाना । जन जन का मन से ,यह नम्र निवेदन है , मन की पीड़ा का , प्रस्तुत आवेदन है । मन का उल्लास कबसे, आहत होकर बैठा , कटु अनुभव का , भारी भरकम प्रतिवेदन है । उम्मीदों के शातिर-कातिल जैसे बनकर , जन गण के रोते मन, और मत रुलाना । गड़े हुए मुर्दे, उखड़ते भी देखे हैं , बडे़ बडे़ घोटाले वाले भी लेखे हैं । अर्थव्यवस्था की साँ... »

From Death 2 Life

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एक राह अक्सर चलोगे

एक राह अक्सर चलोगे

एक राह अक्सर चलोगे मिले न मिले तुम याद अक्सर करोगे, हम गुमसुम बैठे अगर तुम बात अक्सर करोगे , नुमाइश होगी कुछ अगर पूछ लेना हमसे , हमारी याद आये तो तुम बात अक्सर करोगे, ज़िन्दगी की पहल भी अजीब है, जीने की राह मिल जाये तो तुम साथ अक्सर चलोगे, तुम्हे नहीं पता नाम हमारा , तुम बिन नाम के भी याद अक्सर करोगे , कभी भूल जाऊ रास्तें या चहेरे कही, तुम यादों में आकर साथ अक्सर चलोगे, मुझे नहीं पता ये मौत कब गले ... »

To Love in Chains

To love in chains is not to love at all, To love in shame is to render the heart lame. For what is love but a heart set free, Mad with curiosity, LIke a bird once in captivity, Now flying high singing with glee. To love in chains is to rot from within, A heart growing weary and thin, Dying of starvation, grim. The heart thrives on freedom and honesty, Honestly being truthful to oneself expressing ... »

कितने ही दिन गुज़रे हैं पर, ना गुजरी वो शाम अभी तक; तुम तो चले गए पर मैं हूँ, खुद में ही गुमनाम अभी तक! . तुम्ही आदि हो,…तुम्ही अन्त हो,…तुमसे ही मैं हूँ, जो हूँ; ये छोटी सी बात तुम्हें हूँ, समझाने में नाकाम अभी तक! . कैसे कह दूँ, …तुम ना भटको, …मैं भी तो इक आवारा हूँ; शाम ढले मैं घर न पहुँचा, है मुझपे ये इल्ज़ाम अभी तक! . प्यार से, ‘पागल’ नाम दिया था, तूने जो इक रोज़ मुझे; तु... »

“ना पा सका “

“ना पा सका “

ღ_ना ख़ुदी को पा सका, ना ख़ुदा को पा सका; इस तरह से गुम हुआ, मैं मुझे ना पा सका! . जिस मोड़ पे जुदा हुआ, तू हाथ मेरा छोड़ के; मैं वहीँ खड़ा रहा, कि फिर कहीं ना जा सका! . मुझसे इतर भला मेरे, अक्स का वजूद क्या; जो रौशनी ही ना रही, साया भला कहाँ रहा! . साथ है तो अक्स है, जुदा हुआ तो क्या रहा; अरे मैं ही ग़र ना रहा, अक्स फिर कहाँ रहा! . मेरे अक्स, पे ही मेरे, क़त्ल का इल्ज़ाम है; जो आईना गवाह था, वो आईना तो त... »

“मैं कौन हूँ”

“मैं कौन हूँ”

ღღ_मैं कौन हूँ आखिर, और कहाँ मेरा ठिकाना है; कहाँ से आ रहा हूँ, और कहाँ मुझको जाना है! . किसी मकड़ी के जाले-सा, उलझा है हर ख़याल; जैसे ख़ुद के ही राज़ को, ख़ुद ही से छुपाना है! . मेरी पहचान के सवालों पर; ख़ामोश हैं सब यूँ; जैसे पोर-पोर दुखता हो, और बोझ भी उठाना है! . वैसे तो इन गलियों से, मैं मिला ही नहीं कभी; पर इस शहर से लगता है, रिश्ता कोई पुराना है! . इक भूला हुआ फ़साना, ज़हन में उभर रहा है; कोई जो मु... »

“महबूब”

“महबूब”

शबनम से भीगे लब हैं, और सुर्खरू से रुख़सार; आवाज़ में खनक और, बदन महका हुआ सा है! . इक झूलती सी लट है, लब चूमने को बेताब; पलकें झुकी हया से, और लहजा ख़फ़ा सा है! . मासूमियत है आँखों में, गहराई भी, तूफ़ान भी; ये भी इक समन्दर है, ज़रा ठहरा हुआ सा है! . बेमिसाल सा हुस्न है, और अदाएँ हैं लाजवाब; जैसे ख़्वाबों में कोई ‘अक्स’, उभरा हुआ सा है! . जाने वालों ज़रा सम्हल के, उनके सामने जाना; मेरे महबूब के चेहरे से, ... »

“मुलाकात रहने दो”

“मुलाकात रहने दो”

ღღ_आज ना ही आओ मिलने, ये मुलाकात रहने दो; कुछ देर को मुझको, आज मेरे ही साथ रहने दो! . अन्धेरों की, उजालों की, हवाओं की, चिरागों की; या अपनी ही कोई बात छेड़ो, मेरी बात रहने दो! . मैं सोया कि नहीं सोया, मैं रोया कि नहीं रोया; और भी काम हैं तुमको, ये तहकीकात रहने दो! . यूँ तो सैकड़ों रात जागा हूँ, तुम्हारे ही ख्यालों में; पर सोना चाहता हूँ अब, आज की रात रहने दो! . जाते-जाते ‘अक्स’, मेरा इक मशविरा है तु... »

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