अजी कैसा विकास करते हो

अजी कैसा विकास करते हो
छलों को बाहुपाश करते हो

जिन पेड़ो से मिलती है साँसें
उन पेड़ों का विनाश करते हो

हर चीज़ है, पर समय नहीं
ख़ुदकुशी का क्यों प्रयास करते हो

मौन होकर बैठा है घर और
उस पर क्यों मौन उपवास करते हो

ठिठक कर सोई है ज़िंदगी
दीवारों से क्यों उल्हास करते हो

मुठी बंद कर क्यों बैठे हो
रेखाओं का उपहास करते हो

गर तुम ने जहाँ जीता है
मन फिर क्यों उदास करते हो
राजेश’अरमान’

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