जुर्म यह था
जुर्म यह था, कि कोई जुर्म नहीं किया…. गलती यह थी, कि गल नहीं की सजा यूं है मानो प्राण निकल गए काश! कर ले…
जुर्म यह था, कि कोई जुर्म नहीं किया…. गलती यह थी, कि गल नहीं की सजा यूं है मानो प्राण निकल गए काश! कर ले…
Listen Shiv Stuti मुक्ति स्वरूप अनंत अनादि समर्थ शाश्वत सर्वत्र व्यापी निर्गुण निरीह निर्विकल्प नमामि जटा में सुशोभित मोक्ष प्रदायिनी मैं उस ईश्वर को नमन…
मार लो कितने भी हाथी और घोड़े तुम, जान तो मेरी बसा करती है प्यादों में।
गुरूर हो हमें तो अपनी किस अज़मत1 का, जर्रा भर भी नहीं हम, कायनात-ए-अज़ीम2में। 1. प्रतिष्ठा; 2. बहुत बड़ी दुनिया।
जब शागिर्द-ए-शाम तुम हो, ख़्याल-ए-ख़ल्क़ 1 क्या करें, जुस्तुजू 2 ही नहीं किसी जवाब की जब, सवाल क्या करें। 1. दुनिया की परवाह; 2. तलाश।
देखने वालों ने मुझमें कुछ नहीं देखा, बस मेरी जिद देखी, जुनूँ नहीं देखा
ज़िंदगी मेरी आज ज़िंदगी से परेशान है, बात इतनी है, लिबास 1 रूह 2 से अनजान है। तारीकी3 है मगर, दीया भी जला नहीं सकते,…
वो है बहती नदी, मैं एक किनारा हूँ, पाकर भी मैं उसे, हर दफ़ा हारा हूँ।
जानता हूँ तुम नहीं हो पास, समझता भी हूँ, मगर जो मैं महसूस करता हूँ, उसे झुठलाऊँ कैसे।
हैरान हूँ मैं आज अपना बर्ताव देखकर, मैं ऐसा तो नहीं था, न ऐसा होना चाहिए।
इस वीराने में अचानक बहार कहाँ से आ गई, गौर से देखा तो ये महज़ इज़हार-ए-तसव्वुर1 था। 1. कल्पना की अभिव्यक्ति।
ख़्वाहिशें थीं कई, कब ख़त्म हुईं, ख़बर नहीं, कब रूह जिस्म से रुख़्सत1 हुई, ख़बर नहीं। उनसे दीदार2 की दरकार3 थी दिल को कभी, कब…
ग़म में भी मुस्कुराते रहे हम आपकी ख़ातिर, जाम-ए-अश्क1 पीते रहे हम आपकी ख़ातिर। कोई शाम लाएगी आपका पैग़ाम, ये सोच, परवाना बन जलते रहे…
ऐसे ही कहाँ एक नज़्म बना करती है, दर्द घुलता है रूह बनकर अल्फ़ाज़ों में।
इश्तिहार सी गुजर रही है ज़िंदगी मेरी, जैसी दिखती है, वैसी होती नहीं कभी।
रुख़्सत हो गई रूह मेरी, मुझे सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दो, इरादे-पाक से जी लिया बहुत, अब मुझे नापाक कर दो।
इस दुनिया के दस्तूर बड़े ही निराले हैं, इक ख़ुशी की ख़ातिर, कई रंज पाले हैं।
उन्हें हर रोज़ नए चाँद-सा नया पाया हमने, मगर उन्होंने हमें देखा वही पुरानी नज़रों से।
भीख नहीं, मुझे मेरी मज़दूरी दे दो साहब, कमीज़ फट गई मेरी, रेल का झाड़ू बनकर।
शोक-ए-हिज्र1 करूँ या फिर आज जश्न-ए-वस्ल2 करूँ उनके पलभर के आने-जाने में, जिंदगीभर का रसद3 था। 1. विरह का दुख; 2. मिलन का उत्सव;…
फलक के चाँद से, या तेरी याद से जिऊँ किसके सहारे, ऐसे हालात से, मोड़ जो आ गए बनके मेरे दूरियां कैसे किससे कहें अपनी…
सच के आगे झूठ लिखूँ ये मेरा काम नहीं इश्क है मेरा दौलत शोहरत, भले इश्क बदनाम सही घायल लोग यहाँ रहते हैं दिल सीने…
कभी बन्द कमरे भी छोड़ कुछ और भी है इसके आगे क्यूँ तू वक्त खपा रहा फिजूल में, कोई और भी देता है जवाब निकल…
अपनों को दूर से रू-ब-रू 1 होते हुए देखा है, हमने अपनी तमन्ना को लहू होते हुए देखा है। इक कसक जो दिल में दफ़न…
अँधेरी बस्ती में रोशनी राशन में बाँटी जाती है, लोहे के हार पहनकर, ज़िंदगी काटी जाती है। आजकल आफ़ताब1भी आता नहीं है नज़र, हुकूमत चाँद-सितारों…
शोले से जलते जिगर¹, जुगनू से टिमटिमाने लगे, तूफ़ान भी अब यहाँ, झोंके हवा के खाने लगे। तेग़-ए-पुश्त² शायद हो गई है गायब उनकी, जो…
सख़्त मग़रूर 1 चश्म 2 में ज़रा इंतज़ार तो हो इश्क़ उनके लिए भी ज़रा दुस्वार3 तो हो। बता दे अपनी हक़ीक़त जल्दी ही हम…
जाने कैसा शहर था, हर तरफ़ कहर था, धूप ही धूप मिली, दोपहर का पहर था। ख़ामोशी हर तरफ़, ख़ाक-सी फैली हुई, कैसे हो गुफ़्तगू…
बहुत याद आते हैं, सफ़र में बेवक्त बिछड़ने वाले। छोड़ जाते हैं हृदय में बहुत सी यादें और रह जाती हैं तन्हाइयाँ और खामोशियाँ। ऑंख…
वक्त की फ़ितरत में तब्दीली है, जो आज हमारा है वो कल किसी और का होगा। न कर ग़रूर आज पर अपने। आने वाला कल…
वो लड़की सोलह की बातें सत्रह की क्या अजीब थी वो, पर नसीब थी वो, जिसे भूलना अब तो नामुमकिन है लहज़े बड़े नाज़ुक से…
जिन्दगी उम्र भर की सहेली है एक उलझी हुई पहेली है दरिया है ये समंदर की पूछो न तुम फिर भी प्यासी है ये अकेली…
ओ देस से आने वाले बता… क्या लाए हो मेरी ऐसी ख़बर जो झूम उठे दिल के मंज़र और दिल हो ये बेखबर… क्या अब…
वो पान की दुकान वो बरगद की छाँव जहाँ हम मिले.. क्या याद है तुम्हें वो बारिश के छीटें लब पे तेरे जो गिरे सनसनाती…
तू मेरे पहले, मैं तेरे बाद हूँ ये शर्त भी है हार जीत कौन किसके साथ है जज़्बात से छूटकर, लब खोल बोल तू ये…
Okay, so check this out—prediction markets have this weird pull. They feel both inevitable and a little reckless. Whoa! You can bet on elections, economic…
काव्य में कवि मर गया, जब दुनिया उसे बेवफ़ा कह दिया, कोई रत्जगे क्यों करेगा इस मुर्दे पे, उसका जिस्म भी अब मिट्टी हो गया।…
समय सब को प्यारा है, लेकिन खुद का
सो जाते हैं फ़ुटपाथ पर आसमाँ को ओढ़कर, मरे हुए जिस्म कभी ठंड से ठिठुरा नहीं करते।
आह निकली है बहुत यहाँ तक आते-आते, बच आए हैं ज़रा सा, जाँ तक जाते-जाते।
मिज़ाज-ए-गर्दिश-ए-दौराँ1 बदल गया होगा, जो आया है दर पे आज, कल गया होगा। मकाँ-ए-रंक2 में जो आया है इतराता हुआ, ज़रूर वो कल किसी के…
लफ़्ज़ 1 लहूलुहान हैं, कैसे उठाएँगे दर्द का बोझ, हर्फ़2 हसरत लिए किसी की, सो जाते हैं हर रोज़। 1. शब्द; 2. अक्षर।
मेरी नज़्म को अपने ज़ेहन 1 में उतर जाने दे, अहसासों को मेरे ज़रा सा असर कर जाने दे। भटकता रहा हूँ ताउम्र अजनबी दुनिया…
जुगनुओं का क़त्ल करने, काली रात आई है, माहताबों 1 ने अपनी सूरत, बादलों में छुपाई है। सहर का नाम मत लो, शब न ख़त्म…
इतराता फिरता है हर शख़्स भरे बाज़ार में, बिकने वाले सब ख़रीदार का लिबास1 पहने हैं। 1. पोशाक।
जिंदगी को जिंदगी से जुदा कर रखा है, हमने अपनी मौत का गुनाह कर रखा है। बस्ती को रोशन करने की ख़ातिर हमने, अपना घर…
चंद सिक्के हैं जेब में और बेशुमार जरूरतें, चलो चलकर बाज़ार से कुछ ख़्वाहिशें ख़रीद लें।
क्या बताएँ आपको दास्ताँ-ए-दिल 1 अब हम, क़त्ल कर के ख़ुद का, हुए क़ातिल अब हम। तमीज़दार ख़ल्क़ 2 में तमाशबीन 3 हम बन गए,…
आपकी बेरहम यादें और मैं, बहुत सारी फरियादें और मैं। चुप रहेंगी खींचकर आज साँसें, मेरी बेबस निनादें 1 और मैं। इंतज़ार कर रही हैं…
मर्ज़ 1 नहीं मालूम गर तो दवा न दीजिए, बुझा न सको आग तो, हवा न दीजिये। छुपा लो जख्म-ओ-दर्द ज़ेहन 2 में कहीं, यूँ…
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