सचिव सयाने कुटिया में
रहते थे चाणक्य यहाँ पर।
निर्मल हृदयकुञ्ज मनोहर
निर्मल गंगा बहे जहाँ पर।।
एक छत्र राज था भारत
मुँह की खाई जहाँ सिकन्दर।
ह्वेनसांग भी हतप्रभ रह गया
झाँक झाँक भारत के अन्दर।।
जब शासक शोषक बन जाए
प्रजातन्त्र ये आखिर कैसा?
‘विनयचंद ‘ कुछ करो विचार
कैसे बने ये पूर्व के जैसा।।