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हवाओं के किस्से

जब हवा दर्द भरा
किस्सा सुनाती है
मेरी रूह भी
सहम सी जाती है
कहे मैं गई एक दिन
कदम की डारी
अंडों के पास मरी
चिड़िया बेचारी
कहे सब जग
हवा हवाई विषैली
जब खुद जग उड़ाए है
कण सारी मैली
यह लड़ती हवा मुझसे
क्यों ना तू बोले
दिल कैसा कठोर है
जो कभी भी ना डोले
मैं बोलूंगी क्या
बस तू इतना बता दे
जो करूं कहीं शिकायत
तो रिश्वत वह खाते
एक दूंगी उपाय
जो तू उसको माने
उद्योगपति घर यह
धुआं उड़ा दे
जरा उन्हें समझा
कि दम घुटता है कैसे
इंसान तो जीता है
जैसे तैसे वह नन्हे जीव
भला जिए भी तो कैसे

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