सुनसान महल में कोई है जो भटक रही है।
“तूम से है पुराना रिश्ता”
हर बार यही कह रही है।।
कभी करीब से कभी महल के झरोखों से।
क्यों हर रात मुझे जख्म दे रही है।।
न जीने देती है न मरने देती है।
पल पल मुझे बीती पल की एहसास करा रही है।।
कर लुंगा दफ़न खुद को ऐ ‘अमित’।
फिर वही काली रात याद आ रही है।।
अजनबी साया
