ग़ज़ल

तेरे दर्द ने हमें इस तरह बेगाना किया ।

तेरे दर्द ने हमें इस तरह बेगाना किया । तुझे भूलाके हमने खूद को याद किया ।। अपनी पहचान भूलाके हमने साथ प्यार का सपना देखा । कमबख्त! तुने मुफलिस समझे मेरा प्रेम-प्रस्ताव अस्वीकार किया ।। खेले तुमने मेरे जज्बात से झू़ठी मुहब्बत किया तुमने । रंगीन-सी जिन्दगी में आखिर तुमने अपनी बेवफाई की रंग घोली ।। सीधे-सीदे जिन्दगी जी रहें थे हम, खूद में मस्त रहते थे हम ।। तुझसे मुलाकात क्या हुई? कमबख्त! तुने ऐसे-ही... »

क्या लिखूँ जो दुनिया को भाये ।

गजल ।। क्या लिखूँ जो दुनिया को भाये । मैं नहीं तो क्या कोई तो भाये जहां को ।।1।। जहां को अगर लगते है शख्स वो प्यारे । तो मैं क्यूँ महफिल में सरेआम बदनाम हुँ ।।2।। बदनाम मैं नहीं तो क्या वो आम आदमी है । जो जिस्म के बाजार में मेहनत के रोटि खाते है ।।3।। जिनके ऊँची शान है, उनके बोल के भी कुछ दाम है । मगर जहां में फकीर के शान, सब मोल के महान ।।4।। यूँही लोग आज कुछ लिख देते है । लोग बेवजह झंझट मोल लेते... »

याराना

🌹🌹 Friendship Day special🌹🌹 गजल:- याराना प्रेम से भी बड़ा बन्धन, सुकून आये दोस्ती में। कभी कृष्णा कभी अर्जुन याद आये दोस्ती में। अपनी जिंदगी से हार थक करके हर इन्सान, सभी परेशानियां और गम भूल जाये दोस्ती में। बना दे जिंदगी सुंदर निभाओ साथ जब दिल से यकीन करना बड़ा मुश्किल दग़ा गर कोई दे फिर से। दोस्ती है बड़े विश्वास और एहसास का बन्धन, निभाओ इसको तुम निःस्वार्थ हो विश्वास जब दिल से। मेरे मन के मंदिर मे... »

🌹🌹याराना🌹🌹

🌹🌹 Friendship Day special🌹🌹 गजल:- 🌹🌹याराना🌹🌹 प्रेम से भी बड़ा बन्धन, सुकून आये दोस्ती में। कभी कृष्णा कभी अर्जुन याद आये दोस्ती में। अपनी जिंदगी से हार थक करके हर इन्सान, सभी परेशानियां और गम भूल जाये दोस्ती में। बना दे जिंदगी सुंदर निभाओ साथ जब दिल से यकीन करना बड़ा मुश्किल दग़ा गर कोई दे फिर से। दोस्ती है बड़े विश्वास और एहसास का बन्धन, निभाओ इसको तुम निःस्वार्थ हो विश्वास जब दिल से। मेरे मन के मंदि... »

दिल की डूबें न कश्तियां

मेरी पुरनम कहानियां सुनकर।। दिल की डूबें न कश्तियां सुनकर।। तेरे चर्चे में फूलों की ख़ूशबू पास आती हैं तितलियां सुनकर।। दूल्हा बाज़ार से ख़रीदेंगे क्या कहेंगी ये बेटियां सुनकर।। वह मुझे याद कर रही होगी लोग टोकेंगे हिचकियां सुनकर।। सच भी उसको लगे बहाने सा ख़त्म होंगी न दूरियां सुनकर।। »

सफ़र छोड़ना पड़ा

सौ बार सरे-राह सफ़र छोड़ना पड़ा।। मंज़िल पे हर परिन्द को पर छोड़ना पड़ा।। पुश्तैनी घर की जब मेरे दहलीज़ गिर पड़ी घर को बचाने के लिए घर छोड़ना पड़ा।। दहशत के लिए हो रहे हैं हमले चारसू हमलों के ही ज़वाब में डर छोड़ना पड़ा।। अब तो मिला जो काम वही रास आ गया जब बिक नहीं सका तो हुनर छोड़ना पड़ा।। इनसान ने डंसने की रवायत संभाल ली सांपों को शर्म आयी जहर छोड़ना पड़ा।। »

इतना अच्छा नहीं हुँ, जितना कि दुनिया कहती है ।

गज़ल ।। इतना अच्छा नहीं हुँ, जितना कि दुनिया कहती है । मैं कैसा हुँ, ये सिर्फ मैं जानता हूँ ।।1।। खूद के सवालों के कठघड़े में, मैं हरवक्त खड़ा रहता हूँ । दूसरों के नजरों में जो अच्छा बनूँ तो क्या । अपनी नजरों में गिरा रहता हूँ ।।2।। लाख दुनिया करनामे दिखाये तो क्या । इस भौतिक जग में बेच आत्मा को । वही शख्स हूँ मै, जो कभी भूल नहीं पाता । क्षणिक आनंद को, मैं वही गलत विचारों का मारा, हरि का खिलौना हू... »

हमें गैरों से भी मोहब्बत है।

हमको गैरों से भी मोहब्बत है, अकेला तुमसे होता,तो मर जाते। घर से दूर हैं घर के वास्ते, वरना हम भी सोचते हैं ,काश घर जाते। हम खड़े हैं हमने माज़ी से सबक लिया, वक़्त से अकड़ते ,तो हम भी टूट जाते। रूठ जाते हैं लोग बात- बेबात मोहब्बत में, गर तुम मनाते ,तो हम भी रूठ जाते। इस राखी कलाई सरहदों पर है, बहन सोचती है काश भाई घर आ जाते। हमारे बीच ये अनबन पहली मर्तबा तो नहीं, तुम खाली हाथ भी आते तो हम मान जाते।... »

तेरे बिन गुजारा नहीं

रोज मिलने के वादे तोड़ते हो जो तुम बात तेरी ये मुझको गवारा नहीं। बात ही बात पे रूठते हो जो तुम जानते हो तेरे बिन गुजारा नहीं। रोज अपनी गली देखते हो मुझे आशिक हूँ तेरा पर आवारा नहीं। थोड़ा नजरें इनायत फरमाओ तुम गैर नजरों के खातिर सँवारा नहीं। मेरी एकलौती चाहत अरमान तुम डोले हर फूल “राजू” वो भंवरा नहीं।। ~राजू पाण्डेय बगोटी (चम्पावत) »

सनम

राज़ को राज़ ही रहने दो ए सनम। मुझे गवारा नहीं कि तुझे कोई बेवफा कहे सनम। मैने मुहब्बत की है कोई खिलवाड़ नहीं। तेरी रुसवाई को सिन्हे में छुपाया है सनम।। माना कि वफा के बदले मिला बेवफाई । यही तोहफ़ा मेरे लिए अनमोल है सनम ।। मर के भी यह दिल तुझे ही ढूंढेगा। यह झूठ नहीं सच है सनम तेरी कसम।। »

दुआ इतनी है

दुआ इतनी है कि रोज इस तरह भी बेशुमार आएं। दिन ढले तो बहार आए रात गुजरे तो बहार आए। घटाएँ चिलमन हैं खुशियाँ हैं रोशनी की किरण, घटाएँ ढलती रहें रोशनी के गुबार आएं। हमारी बात और है कि रहते हैं हम अंधेरों में, तुम उजाले हो क्यों न हमें तुम पर प्यार आए। कुछ समझ नहीं आता क्या बात है चेहरे में, देखें तो खुमार आए बिन देखे न करार आए। आज का दिन हो उल्फत का तरन्नुम हो साज हो, आज ही आज हो कल कभी कभार आए। जिंद... »

हमें भी पिलाइए

मेरे लबों की आप सदा बनके आइए। खुद जाम पीजिए, हमें भी पिलाइए। नज़रों में आपकी मयखाना नज़र आये। मखमूर क्यों न हो इनमें जो उतर जाए। मयकश की लाज रखिए तशरीफ़ लाइए। खुद जाम पीजिए हमें भी पिलाइए। जादू की कशिश हैं ये जलबों भरी अदायें। जुल्फों में भी हजारों महफूज हैं घटायें। छिटकाइए ये जुल्फ प्यास को बुझाइए। खुद जाम पीजिए हमें भी पिलाइए। खुशरंग गुलबहार है ये हुस्न आपका। बेदाग चाँद जैसा है चेहरा जनाब का। हो जा... »

पत्थरों की तरह आदतें हो गयीं

हम भी रोये नहीं मुद्दतें हो गयीं। पत्थरों की तरह आदतें हो गयीं। जबसे बेताज वह बादशाह बन गया, पगड़ियों पर बुरी नीयतें हो गयीं। जख्म भी दर्द देते नहीं आजकल, कम सितमगर तेरी रहमतें हो गयीं। खुशनुमां एक चेहरा दिखा ख्वाब में, तबसे जागे न हम मुद्दतें हो गयीं। थी खबर आदमी हैं उधर राह में, जो भी गुजरा उसे आफ़तें हो गयीं। एक मुफ़लिस था वो रोटियाँ माँगकर, झोलियाँ भर गया नेमतें हो गयीं। शौक जबसे अमीरी का चढ़ने लग... »

तुम झूठ किसी और दिन बोलना

सच कभी हमारा दामन नहीं छोड़ता  कोई भटकाव हमारा प्रण नहीं तोड़ता  जब भी विरोधाभास का आभास हुआ  हम कोई प्रतिक्रिया देते वक़्त नहीं भूले  अपने शब्दों को बोलने से पहले तोलना  फिर भी जाने क्यूँ कहने वाले कह ही गए  तुम झूठ किसी और दिन बोलना तुम झूठ किसी और दिन बोलना हमने फिर भी बेरुखी नहीं अपनायी  लाख चाहे लफ़्ज़ों के हेर फेर की  अक्सर बेतरतीबी से चोट खायी  लेकिन सम्मान देने की खातिर  हमने कभी फटे में टांग न... »

धैर्य

चारो तरफ कयामत ही कयामत है। जिधर देखो करोना के ही क़हर है।। महामारी में जी रहे है हम और आप। फिर भी उम्मीद के किरण जलाए बैठे है।। आज नहीं तो कल होंगे कामयाब हम। बस कुछ और धैर्य रखने की जरूरत है ।। »

धधक रहा है मुल्क

धधक रहा है मुल्क, और कुछ आग मेरे सीने में। वफ़ादारी खून में नहीं तो फिर क्या रखा जीने में। वतन परस्ति से बढ़कर, और कोई इबादत नहीं, वतन परस्ति का सुकून, न काशी में न मदीने में। सियासत के ठेकेदार, देश जला सेंक रहे हैं रोटी, हमारे घरों में रोटी, मिलती मेहनत के पसीने में। अच्छे ताल्लुकात हैं उनसे जिन्हें मैं जानता हूँ, वो पत्थर नहीं फेंकते, चढ़ ऊँची इमारत के ज़ीने में। बिखरना लाज़मी है, जब मजहबी दरार ... »

तन्हाई हमें रास आने लगी

महफ़िलों से डर लगने लगा, तन्हाई हमें रास आने लगी दोस्तों में हमें ऐ ख़ुदा, दुश्मनी की बांस आने लगी समझा था जिसे अपना हमसफ़र, उसी ने बदल दी है अपनी डग़र दो राहे पे हमें छोड़कर, चल दिये वो मुंह मोड़कर आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी दोस्तों में हमें ऐ ख़ुदा दुश्मनी की बांस आने लगी सपने मिट गए, अरमां लुट गए, भरे बाज़ार में हम तो लुट-पिट गए जब लुट गए तब लगी थी ख़बर, हमीं को हमारी लगी थी नज़र जुबां चुप... »

जुबां जो कह नहीं सकती..

जुबां जो कह नहीं सकती आंखें वो राज़ कहती हैं। दिल में जो कुछ भी चलता है धड़कनें आवाज करती हैं । लगाए लाख भी पहरे दिलों पर चाहे जमाना, मोहब्बत तोड़कर पहरे दिल को आजाद करती है। मिले ना दुनिया की शोहरत सच्चा दिलदार मिल जाए। जहां में प्यार की दौलत ही सच में आबाद करती है। किसी को टूट कर चाहो अगर वो छोड़ दे दामन, एक तरफा मोहब्बत ही ‘प्रज्ञा’ जलाकर खाक करती है। »

दीवाने

तलाशी जिस्म की खुलेआम दे दी। सब दिखाया पर दिल दिखाया नहीं। ढूढ़ते रहे हार के लौटना पड़ा सबको, जब हाथ लगाया दिल धड़काया नहीं। ढूंढते ढूंढते रात दिन हाथ से निकले, रूह में रहे वो हम ही को बताया नहीं। सबके सामने खुले आम जीते रहे हम, हमने तो सच किसी से छिपाया नहीं। उनकी यादों में दीवाने हुए इस कदर, आँखों को भिगाया राही सुखाया नहीं। राही अंजाना »

क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर

अब तो घर में भी रहना कारावास है क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर। देख विरयानी में भी है खिचड़ी का स्वाद क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर।। क्यों अनजाना -सा लगता है अपना शहर क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर। बड़ी मुश्किल -सी लगती ज़िन्दगी वसर क्योंकि दरबाजे पे बैठा कोरोना कहर।। »

कोई एक दीवाना

मुद्दत बाद ए दोस्त भेजा उसने मेरे नाम इश्क़ ए पैगाम। गुजर गया वो जमाना कभी याद करते थे उनको सुबह शाम।। न मै बेवफा थी न वो बेवफा था बेवफा था ए ज़ुल्मी जमाना।। सोचा था मुकद्दर साथ देगा ए दोस्त निकला वह भी बेगाना।। कुदरत के तमाशा तो देखिए मै कहाँ आज वो कहाँ सूखे पत्तों पे मेंहदी के रंग चढाने चले है फिर कोई एक दीवाना।। »

जुस्तजू

आज की रात कयामत की रात है। गर तुम हो मेरे साथ तो जन्नत की बात है।। थी जुस्तजू तुम्हें पाने को मगर। क्या करू सब की अपनी मुकद्दर है।। डर है मुझे कहीं ए चिराग बुझ न जाए। इसलिए हवा के रुख बदलने का इरादा है।। »

बे-वफा

उनके मस्त अदाओं के जाल में,हम गिरफ्तार हो गए। जुस्तजू के मेले में हमारी मुकद्दर, हम से ही खफ़ा हो गए।। वफा से बे -वफा बनेंगे वो , हमने ऐसा सोचा ही कब था । हम तो बस उनके लिए छोटा सा महल बनाने में लग गए।। बने थे कभी वो मेरे दोस्त, मेरे हमदम, मेरे इब्तिदा । उनके मुस्कान को हम इश्क़ के सिलसिला समझने लग गए।। »

गलतफहमियों के बीज

गलतफहमियों के बीज अविश्वास से पनपते हैं अधसुनी बातों को लोग पूरा सच समझते हैं बड़े तो हो चले हैं हम अपनी नजरों में प्रज्ञा ! ना जाने लोग क्यों मुझे अभी छोटा ही समझते हैं जीने की उम्मीद खत्म हो चुकी है मगर जिंदा अभी हैं हम ये बात समझ ना आई! वो मुझे मुर्दा क्यों समझते हैं? दाग दर्पण में है चेहरे पर मेरे एक भी नहीं फ़क़त इतनी-सी बात वो क्यों नहीं समझते हैं उलझे हैं हम या हमारी जुल्फों में कई राज इस र... »

मौजूदा हालात पे ग़ज़ल

आदाब मुफ़लिसों को क्यों मिली है जिंदगी बारहा ये सोचती है जिंदगी ज़िंदगी जैसे मिली ख़ैरात में ऐसे उनको देखती है जिंदगी इस जहाँ में बुज़दिलों के वास्ते बस क़ज़ा है, तीरगी है ज़िन्दगी ख़ुदकुशी से क्या मिला है आज तक सामना कर कीमती है जिंदगी बंद आँखों से कभी सुन सरगमें इक सुरीली बाँसुरी है जिंदगी दिल में हो उम्मीद की कोई किरन रौशनी ही रौशनी है जिंदगी हर घड़ी तैयार रहना ‘आरज़ू’ इम्तिहानों से भरी है जि... »

बेटियों पर एक ग़ज़ल

ग़ज़ल दौलत नहीं, ये अपना संसार माँगती हैं ये बेटियाँ तो हमसे, बस प्यार माँगती हैं दरबार में ख़ुदा के जब भी की हैं दुआएँ, माँ बाप की ही खुशियाँ हर बार माँगती हैं माँ से दुलार, भाई से प्यार और रब से अपने पिता की उजली दस्तार माँगती हैं है दिल में कितने सागर,सीने पे कितने पर्बत धरती के जैसा अपना, किरदार माँगती हैं आज़ाद हम सभी हैं, हिन्दोस्ताँ में फिर भी, क्यों ‘आरज़ू’ ये अपना अधिकार माँगती हैं... »

जिसे सर झुकाने की आदत नहीं है

जिसे सर झुकाने की आदत नहीं है उसे हर बशर से मोहब्बत नहीं है दुःखा दिल किसी का ख़ुशी मैं मनाऊँ मेरे दिल की ऐसी तो फ़ितरत नहीं है वो अपने किए पर पशेमां बहुत है नज़र भी मिलाने की हिम्मत नहीं है बहा आई दरिया में लख़्त ए जिगर को ज़माने से लड़ने की ताक़त नहीं है समझ आ चुका है ये रिश्तों का मतलब किसी आसरे की ज़रूरत नहीं है »

मेरे दिल का नज़राना

कभी मायूस होती हूँ कभी बेचैन होती हूँ मगर तेरी मोहब्बत में डूबी दिन-रैन होती हूँ, कभी बातें कभी यादें कभी तन्हाई में तुझको भुलाकर सब ओ मेरी जान सिर्फ तुझमें ही खोती हूँ । ——————————————————- मेरे दिल का नजराना मुबारक हो तुम्हें साहिब मेरे किस्से मेरे सपने मुबारक हो तुम्हें साहिब जो ना दे सके... »

कड़ाई से लड़ाई

आओ साथी करे हम कोरोना पे कड़ाई। यही से होगी हमारी भारत की लड़ाई ।। वार पे वार हम सहते गए,अब न सहेंगे । चलो चलें हम करे पीड़ितों की भलाई।। यही बनता है हमारा अपना परम धरम । इसी में छिपी है मानवता की सच्चाई ।। »

वफा से बे – वफा

माथे पे आज पसीना के बूंद आया है क्यों। जो कल तक थे हमारे आज अजनबी है क्यों।। दामन – ए – यार का जब साथ पकड़ा था मैने। हल्की मुस्कान से हम पर वार किए थे क्यों।। जन्म जन्म का वादा था साथ निभाने का । आज वादे को कबर में दफना के मुस्करा रहे है क्यों।। गैर के हाथों में है आज उनके नाजुक से हाथ। वफा के दिलासा दिलाने वाली तू बे-वफा बनी क्यों।। सोचा था सारी खुशियां तुम्हारे दामन में डाल दूँगा। ए ... »

ग़ज़ल

ग़ज़ल ——- दूरियां ,नज़दीकियां, खुशफहमियां तेरे साथ में, हम मिले ना थे कभी पर बह गए जज्बात में। 1. मौसमै अंदाज था कुछ खास था उस रात में, थे गिरफ्त में इश्क के उस बेवजह सी बात में। थी नहीं मंजूर हद …इश्क की बरसात में, दूरियां नजदीकियां खुशफहमियां तेरे साथ में…… 2. जब्बे सैलाबे मोहब्बत ले रहा उफान था, धड़कने बेकाबू थी दिल में अजब तूफ़ान था। तेरी आहट देती थी बस.. दिल को थ... »

इंसानियत के दुश्मन

जो इंसानियत की दुश्मन बन जाये, वो जमाअत कैसी। खुदा ने भी लानत भेजी होगी, इबादत की ये बात कैसी। खुद की नहीं ना सही, अपनों की तो परवाह कर लेते, जिन्हें अपनों की परवाह नहीं, दिलों में जज़्बात कैसी। जहाँ जंग छिड़ी मौत के खिलाफ, जिंदगी बचाने को, वहाँ मौत के तांडव की, फिर से नई शुरुआत कैसी। मौत किसी का नाम पूछ कर तो, दस्तक नहीं देती, ये कोई मजहबी खेल नहीं, फिर यह बिसात कैसी। जूझ रहे कई कर्मवीर, हमारी हि... »

आज कल सोंचता बहुत है दिल ये मेरा

पेश है आपकी खिदमत में:- गज़ल आज कल सोंचता बहुत है दिल ये मेरा तुझे भूलूँ या कैद दिल में करूँ ———————— दिल लगा लूँ या जान छुड़ा लूँ तुमसे आज कल सोंचता बहुत है दिल ये मेरा ————————– गज़ल सुना के सुलाये हैं मैनें जो एहसास उन्हें जगा लूँ या सुला दूँ है बड़ी उलझन ——————&... »

ग़ज़ल। सभी को मौत के डर ने ही..

आदाब सभी को मौत के डर ने ही ज़िंदा रक्खा है ख़ुदाया फिर भी ये इंसाँ इसी से डरता है हमारी साँस भी चलती उसी की मर्ज़ी से ही जहाँ में पत्ता भी उसकी रज़ा से हिलता है हमेशा आस का दीपक जला के रखना तुम अँधेरे रास्ते है, तू सफ़र पे निकला है वो सारे चल पड़े थे, तिश्नगी लिये अपनी किसी ने कह दिया सहरा में कोई दरिया है ज़मी पे अजनबी भी अजनबी नहीं होता बुलंदी पे जो है अक्सर अकेला होता है ये ज़िंदगी है, इसे नासमझ सा बन... »

राह भूल सी गई है हमको

राह भूल सी गई है हमको जो छोड़ आओ, तो बात बने मंज़िल की सरहद पर दीया जो छोड़ आओ, तो बात बने मेरी तेरी या उसकी बातें जो छोड़ आओ, तो बात बने ढाई आखर हर देहरी पर जो छोड़ आओ,तो बात बने »

हिन्दी गजल

गम के आँसू सदा हीं बरसता रहा। मेरा जीवन खुशी को तरसता रहा।। मैंने मांगा था कोई ना सोने का घर प्यार की झोपड़ी को तरसता रहा। ना तुम्हारा रहा ना हमारा रहा गेन्द-सा दिल हमेशा उछलता रहा।। गैर की है दुनिया में तेरी खुशी ,फिर तेरा मन मेरे मन को काहे लपकता रहा। जरा बचके निकलना ‘विनयचंद ‘यहाँ प्यार की राह अश्कों से धधकता रहा।। »

क्या हुआ है शहर को आख़िर

आप सब की नज़र को आख़िर , क्या हुआ है शहर को आख़िर . नफरतों की लिए चिंगारी , लोग दौड़े कहर को आख़िर . चाँदनी चौक की वह दिल्ली , आज भूखी गदर को आख़िर . मजहबी क्यों सियासत करके , घोलते हो ज़हर को आख़िर . जिस्म से दूर रहकर भरसक , रूह तड़पी सजर को आख़िर . ज़िन्दगी का हिसाब क्या दें , जिंदगी भर बसर को आख़िर . ऐ ज़मानों वफ़ा मत परखो , फैशनों में असर को आख़िर . खामखाँ प्यार करके ‘रकमिश’ , रौंद बैठे जिगर को आ... »

Maatam Manaiye

दिल के टूटने का भी, क्या मातम मनाइए किस को है सारोकार, ज़रा कम मनाइए वो फिर किसी के दिल को, शीशे सा तोड़ेंगे उस बदनसीब का अभी से गम मनाइए »

रुबाई

कभी सोचा ना हो वह काम हो जाता है, जो करीब है वह दूर चला जाता है। मासूम सा चेहरा इन नाज़ुक-ए- हथेलियों से, हिना का रंग-चंद अश्कों से उतर जाता है। फरेब करने वाले खुश रहते हैं नसीहत से, ईमान ताउम्र का गम खरीद लाता है। ना कुछ पास था बस सच्ची मोहब्बत थी, अब तो प्यार करने वाला भी बेईमान नजर आता है। ना सोंच पास है जो कल भी नजर आएगा, साया है करीब आके बड़ी दूर चला जाता है। जो लब-ए- रुखसार बोलने में थर-थराते... »

हादसा

तेरी दुआओं का असर है, वरना मैं तो मरने वाला था। एक हादसा जो टल गया, सर से जो गुजरने वाला था। जिंदा तो हूं पर हाथ नहीं है, वरना मांग तेरी भरने वाला था। आवाज तुमने भी दिया नहीं, वरना मैं तो ठहरने वाला था। ख़ैर, जहां भी रहो खुश रहो, जिंदगी नाम तेरे करने वाला था। देवेश साखरे ‘देव’ »

नज़रे-करम

मोहब्बत की कर नज़रे-करम मुझ पर। यूँ ना बरपा बेरुख़ी की सितम मुझ पर। तेरी मोहब्बत के तलबगार हैं सदियों से, अपनी मोहब्बत की कर रहम मुझ पर। न मिलेगा मुझसा आशिक कहीं तुझे, तेरी तलाश कर बस ख़तम मुझ पर। तोड़ दे गुरूर मेरा, गर तुझे लगता है, पर ना तोड़ अपनी क़लम मुझ पर। एक तू ही है, नहीं कोई और जिंदगी में, आज़मा ले, पर ना कर वहम मुझ पर। देवेश साखरे ‘देव’ »

तुम पास नहीं

वाह रे कुदरत तेरा भी खेल अजीब। मिलाकर जुदा किया कैसा है नसीब। जब सख्त जरूरत होती है तुम्हारी, तब तुम होती नहीं हो, मेरे करीब। सब कुछ है पास मेरे, पर तुम नहीं, महसूस होता है, मैं कितना हूं गरीब। या खुदा, ये इल्तज़ा करता है ‘देव’, वस्ले-सनम की सुझाओं कोई तरकीब। देवेश साखरे ‘देव’ »

अफ़सोस

किसी को देख, ना कर अफ़सोस । यूँ ना अपनी किस्मत को तू कोस । भले ही तन से नहीं हैं हम पास, भले ही ना ले सकूँ तुझे आगोश । पर मन तो एक दूजे के पास ही है, दिल की सदा सुन, ज़ुबां है ख़ामोश। ख़ुदा ने एक दूजे के लिए ही बनाया, आंखें मूंद, नज़र आएगी फ़िरदौस। देवेश साखरे ‘देव’ सदा- आवाज़, फ़िरदौस- स्वर्ग »

अमन चैन न हो

हिन्दी गजल- अमन चैन न हो सियासत कैसी जिसमे अमन चैन ना हो | साजिस ऐसी जहा भाई से भाई प्रेम ना हो | समझते है हम सब जिसे मसीहा अपना | लगे धारा एक सौ चौवालिस जुलूस बैन ना हो | चमकाने सियासत किस हद तक जाएँगे | आलाप बेसुरा राग जिसमे कोई धुन ना हो | सही को बताकर गलत हासिल होगा ना कुछ | बनेगा कैसे रहनुमा जिसमे कोई गुण ना हो | लड़वाकर भाई से भाई को तुम भी ना बचोगे | खुलेगा नहीं खाता कुर्सी अच्छा सगुण ना हो ... »

क्या लीजिएगा

कहिए हुज़ूर और क्या लीजिएगा। दिल तो ले चुके अब जाँ लीजिएगा। तुम्हें हमसे मोहब्बत है या फिर नहीं, फैसला जो भी लो बजा लीजिएगा। मेरी ज़ुबाँ पर बस एक तेरा ही नाम, नाम मेरा भी तेरी ज़ुबाँ लीजिएगा। डूब ना जाऊँ कहीं गम के पैमाने में, जाम आँखों से छलका लीजिएगा। खो ना जाऊँ ज़हाँ की भीड़ में कहीं, अपनी आगोश में समा लीजिएगा। ‘देव’ जीना मरना रख छोड़ा हाथ तेरे, गर साथ जीना हो तो बचा लीजिएगा। देवेश ... »

गलतफहमी

तीरे-नज़र से दिल जार-जार हुआ। ऐसा एक बार नहीं, बार-बार हुआ। देख उनकी तीरे-निगाहें, ऐसा लगा, कि उन्हें भी हमसे, प्यार-प्यार हुआ। करीब आते, हकीक़त से वास्ता पड़ा, मोहब्बत नहीं, दिल पे वार-वार हुआ। जिंदगी की रहगुज़र में ‘देव’ अकेला, ना कोई हमसफर, ना यार-यार हुआ। देवेश साखरे ‘देव’ »

तिजारत बन गई है

तालीम और इलाज, तिजारत बन गई है। कठपुतली अमीरों की, सियासत बन गई है। मज़हबी और तहज़ीबी था, कभी मुल्क मेरा, वह गुज़रा ज़माना, अब इबारत बन गई है। लोग इंसानियत की मिसाल हुआ करते कभी, आज दौलत ही लोगों की इबादत बन गई है। धधक रहा मुल्क, कुछ आग मेरे सीने में भी, दहशतगर्दों का गुनाह हिक़ारत बन गई है। यहाँ कौन सुने दुहाई, कहाँ मिलेगी रिहाई, ज़ेहन ख़ुद-परस्ती की हिरासत बन गई है। देवेश साखरे ‘देव’... »

पूस की रात

फकीर बन तेरे दर पर आया हूं एक मुट्ठी इश्क बक्शीश में दे देना आशिक समझ दर से खाली ना भेजना अमीर हो तुम चंद सांसे उधार दे देना किस्मत की लकीरें हैं जुड़ी तुझ संग ख्वाहिशों से भरी है झोली चंद आरजू दे देना दुआओं में तुमको ही है मांगा सनम कुछ चंद लम्हों का एहसास भर दे देना दिल- ए- मरीज हूं तेरी जुस्तजू का जानां रहमों करम ना सही इश्क- ए- दर्द दे देना पूस की रात में सर्द हवाओं के अलाव में बस एक शाम तुम अप... »

ज़िन्दगी रंगीन हो जाता

कर गुज़रता कुछ तो, ज़िन्दगी रंगीन हो जाता। जो किया ही नहीं, वो भी ज़ुर्म संगीन हो जाता। मैं क्या हूँ, ये मैं जानता हूँ, मेरा ख़ुदा जानता है, आग पर चल जाता तो, क्या यकीन हो जाता। कुसूर बस इतना था, मैंने भला चाहा उसका, काश ज़माने की तरह, मैं भी ज़हीन हो जाता। तोहमतें मुझ पर सभी ने, लाख लगाई लेकिन, ज़माने की सुनता गर मैं, तो गमगीन हो जाता। नशे में जहाँ है, मैं भी गुज़रा हूँ, उन गलियों से, सम्भल गया व... »

नही मिलते

ये रास्तें है कैसे हमसफ़र नही मिलते, छूट गए जो पीछे उम्र भर नही मिलते! सूख चूके है उनके दीदार के इंतजार में, हरे-भरे अब ऐसे शजर नही मिलते! तार-तार होते रिश्तों पर खड़ी दीवार हो गई, मोहब्बत हो जहां अब ऐसे घर नही मिलते! एक दूजे की मुसीबत में काम आए कोई, दरिया दिल लोग अब मगर नही मिलते! मिल जाये ठिकाना इस उखड़ती सांस को, न गांव मिलते है अब और शहर नही मिलते! वक्त की भीड़ में न जाने रातें कहाँ खो गई, चैन की... »

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